श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 11: जड़ भरत द्वारा राजा रहूगण को शिक्षा  »  श्लोक 10

 
श्लोक
गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि
विसर्गरत्यर्त्यभिजल्पशिल्पा: ।
एकादशं स्वीकरणं ममेति
शय्यामहं द्वादशमेक आहु: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
गन्ध—गन्ध, महक; आकृति—रूप; स्पर्श—छूने का बोध; रस—स्वाद; श्रवांसि—तथा शब्द; विसर्ग—मलत्याग; रति— संभोग; अर्ति—गति, संचलन; अभिजल्प—भाषण; शिल्पा:—पकडऩा या छोडऩा, लेना-देना; एकादशम्—ग्यारह; स्वीकरणम्—स्वीकार करते हुए; मम—मेरा; इति—इस प्रकार; शय्याम्—यह शरीर; अहम्—मैं; द्वादशम्—बारहवाँ; एके— कुछ लोगों ने; आहु:—कहा है ।.
 
अनुवाद
 
 शब्द, स्पर्श, रूप, स्वाद (रस) तथा गन्ध—ये पांच ज्ञानेन्द्रियों के व्यापार हैं। भाषण, स्पर्श, संचलन, मलत्याग तथा संभोग—ये कर्मेन्द्रियों के कार्य हैं। इसके अतिरिक्त एक अन्य धारणा है, जिसके अन्तर्गत मनुष्य सोचता है कि, “यह मेरा शरीर है, यह मेरा समाज है, यह मेरा परिवार हैं, यह मेरा राष्ट्र है।” यह ग्यारहवाँ व्यापार मन का है और मिथ्या अहंकार कहलाता है। कुछ दार्शनिकों के अनुसार यह बारहवाँ व्यापार है और इसका कार्यक्षेत्र शरीर है।
 
तात्पर्य
 ग्यारह विषयों के लिए (व्यापार) भिन्न-भिन्न उत्पादन हैं। नाक से हम सूँघते हैं, आखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं और इस प्रकार हम ज्ञान संचित करते हैं।
इसी तरह हाथ, पाँव, लिंग, गुदा, मुख आदि कर्मेन्द्रियाँ हैं। जब मिथ्या अहंकार का विस्तार होता है, तो मनुष्य सोचता है, “यह मेरा शरीर, परिवार, समाज, देश है।”
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥