श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 11: जड़ भरत द्वारा राजा रहूगण को शिक्षा  »  श्लोक 17

 
श्लोक
भ्रातृव्यमेनं तददभ्रवीर्य-
मुपेक्षयाध्येधितमप्रमत्त: ।
गुरोर्हरेश्चरणोपासनास्त्रो
जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोषम् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
भ्रातृव्यम्—बलवान शत्रु को; एनम्—इस मन; तत्—वह; अदभ्र-वीर्यम्—अत्यधिक शक्तिमान; उपेक्षया—उपेक्षा से; अध्येधितम्—वृथा ही शक्ति में बढ़ा हुआ; अप्रमत्त:—मोहरहित; गुरो:—गुरु के; हरे:—श्रीभगवान् के; चरण—चरण कमलों का; उपासना-अस्त्र:—उपासना रूपी अस्त्र; जहि—जीत लो; व्यलीकम्—झूठा, मिथ्या; स्वयम्—अपने आप; आत्म-मोषम्— जीवात्मा की स्वाभाविक स्थिति को प्रच्छन्न करने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 यह अनियंत्रित मन जीवात्मा का सबसे बड़ा शत्रु है। यदि इसकी उपेक्षा की जाती है या इसे अवसर प्रदान किया जाता हैं, तो यह प्रबल से प्रबलतर होकर विजयी बन सकता है। यद्यपि यह यथार्थ नहीं है, किन्तु यह अत्यधिक प्रबल होता है। यह आत्मा की स्वाभाविक स्थिति को आच्छादित कर देता है। हे राजन्, इस मन को गुरु के चरणारविन्द तथा भगवान् की सेवा रूपी अस्त्र से जीतने का प्रयत्न कीजिये। इसे अत्यन्त सतर्कता से करें।
 
तात्पर्य
 जिस एक अस्त्र से मन को जीता जा सकता है, वह है उपेक्षा। मन सदैव हमें इसे अथवा उसे कर लेने के लिए कहता रहता है; अत: हमें मन के आदेशों की उपेक्षा करने में पटु बनना चाहिए। मन को क्रमश: आत्मा के आदेश मानने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। मनुष्य को मन के आदेशों का पालन नहीं करना है। श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर कहा करते थे कि जगने के बाद तथा सोने के पूर्व नित्य ही मन को कई बार जूतों से पीटना चाहिए। इस प्रकार से मन को वश में किया जा सकता है। समस्त शास्त्रों का भी यही आदेश है। यदि मनुष्य ऐसा नहीं करता तो वह मन के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य है। दूसरी प्रामाणिक विधि है गुरु की आज्ञाओं का कठोरता से पालन करना और ईश्वर की सेवा में लगे रहना। इससे मन स्वत: वश में आ जाएगा। श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रील रूप गोस्वामी को उपदेश दिया है कि—
ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव।

गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज ॥

जब गुरु तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के अनुग्रह से भक्ति-बीज प्राप्त होता है, तो मनुष्य का असली जीवन प्रारम्भ होता है। यदि वह गुरु की आज्ञा का पालन करता है, तो कृष्ण के अनुग्रह से वह मन की दासता (सेवा भाव) से मुक्त हो जाता है।

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध के अन्तर्गत “जड़ भरत द्वारा राजा रहूगण को शिक्षा” नामक ग्यारहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥