श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 12: महाराज रहूगण तथा जड़ भरत की वार्ता  »  श्लोक 7

 
श्लोक
शोच्यानिमांस्त्वमधिकष्टदीनान्
विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि ।
जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो
न शोभसे वृद्धसभासु धृष्ट: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
शोच्यान्—शोचनीय है; इमान्—ये सब; त्वम्—तुम; अधि-कष्ट-दीनान्—अपनी दरिद्रता के कारण बेचारे लोग और अधिक कष्ट उठा रहे हैं; विष्ट्या—बलपूर्वक; निगृह्णन्—पकड़े हुए; निरनुग्रह: असि—तुम अत्यन्त दया से हीन हो; जनस्य—सामान्य लोगों का; गोप्ता अस्मि—मैं रक्षक (राजा) हूँ; विकत्थमान:—डींग मारते हुए; न शोभसे—तुम्हें शोभा नहीं देता; वृद्ध सभासु—विद्वानों की सभा में; धृष्ट:—बढ़-चढक़र बातें करने वाला, उद्धत ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु यह सच है कि बेगारी में तुम्हारी पालकी ले जाने वाले ये निर्दोष व्यक्ति इस अन्याय के कारण कष्ट उठा रहे हैं। उनकी दशा अत्यन्त शोचनीय है, क्योंकि तुमने अपनी पालकी ले जाने के लिए जबरन उन्हें लगा रखा है। इससे सिद्ध होता है कि तुम क्रूर तथा निर्दय हो। तो भी अहंकारवश तुम यह सोच रहे थे कि तुम प्रजा के रक्षक हो। यह हास्यास्पद है। तुम जैसे मूर्ख को ज्ञानी पुरुषों की सभा में भला कौन महान् पुरुष मान सकता है?
 
तात्पर्य
 राजा रहूगण को अपने राजा होने का अभिमान था और वह सोचता था कि उसे अपनी प्रजा पर अपनी इच्छानुसार नियंत्रण रखने का उसे अधिकार था जबकि वह बेगारी में लोगों से पालकी ढुलवा कर अकारण ही उन्हें पीडि़त कर रहा था। इतने पर भी वह अपने को प्रजा का रक्षक मानता था। वस्तुत: राजा को श्रीभगवान् का प्रतिनिधि होना चाहिए। इसीलिए वह नरदेवता—अर्थात् मनुष्यों में राजा—कहलाता है किन्तु यदि राजा अपने को राज्य का प्रमुख समझकर प्रजा का उपयोग अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए करता है, तो वह गलती करता है। विद्वान ऐसी प्रवृत्ति की प्रशंसा नहीं करते। वैदिक नियमों के अनुसार राजा को विद्वान साधुओं, ब्राह्मणों तथा विद्वानों से सलाह लेनी चाहिए जो कि धर्मशास्त्र में दिये गये आदेशों के अनुसार सलाह देते हैं। राजा का धर्म है कि वह इन आदेशों को माने। विद्वानजन राजा द्वारा प्रजा का उपयोग कभी पसन्द नहीं करते। उसे चाहिए कि वह प्रजा को संरक्षण प्रदान करे। राजा को ऐसा दुष्ट नहीं सिद्ध होना चाहिए कि वह अपने स्वार्थ हेतु प्रजा का शोषण करे।
श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि कलियुग में राज्य के शासक डाकू तथा चोर होंगे। ये डाकू तथा चोर जनता के धन तथा उनकी सम्पत्ति को छल से या बलपूर्वक ले लेते हैं। इसीलिए श्रीमद्भागवत में कहा गया है—राजन्यैर्निर्घृणैर्दस्यु-धर्मभि:। ज्यों-ज्यों कलियुग पास आ रहा है, ये लक्षण पहले से ही दृष्टिगोचर होने लगे हैं। हम सोच सकते हैं कि कलियुग के अन्त तक मानवीय सभ्यता किस अधोगति को प्राप्त होगी। निस्संदेह, कोई ऐसा ज्ञानी पुरुष नहीं बचेगा जो ईश्वर को तथा उसके साथ हमारे सम्बन्धों को समझ सके। दूसरे शब्दों में कहना चाहें तो कह सकते हैं कि सभी मनुष्य पशु तुल्य हो जाएँगे। उस समय समाज को सुधारने के लिए श्रीकृष्ण कल्कि अवतार के रूप में प्रकट होंगे। उनका कार्य होगा अन्तत: नास्तिकों का वध, क्योंकि अन्तत: विष्णु या कृष्ण ही वास्तविक त्राता हैं।

जब तथाकथित राजा तथा राज्य के आमात्य कुव्यवस्था फैलाते हैं, तो ईश्वर अवतार लेते हैं और व्यवस्था लाते हैं। श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं—यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। निस्संदेह, इसमें अनेक वर्ष लगते हैं, किन्तु नियम यही है कि जब राजा या आमात्य उचित नियमों का पालन नहीं करते तो प्रकृति युद्ध, अकाल इत्यादि के रूप में दण्ड देती है। अत: यदि वे जीवन के परम उद्देश्य से परिचित नहीं हैं, तो उन्हें प्रजा पर शासन करने का भार नहीं लेना चाहिए। वस्तुत: प्रत्येक वस्तु के परम स्वामी तो भगवान् विष्णु हैं। वह सबों का पालक हैं। राजा, पिता तथा अभिभावक ये तो भगवान् विष्णु के प्रतिनिधिमात्र होते हैं जिनके ऊपर व्यवस्था की रखवाली तथा व्यवस्था को बनाये रखने का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। अत: राजा का यह कर्तव्य है कि प्रजा को इस प्रकार रखे कि उसे अन्तत: जीवन-उद्देश्य का ज्ञान हो सके। न ते विदु: स्वार्थगतिं हि विष्णुम्। दुर्भाग्यवश न तो राजा, न ही जनता यह जानती है कि जीवन का परम उद्देश्य भगवान् विष्णु को जानना और उन तक पहुँचना है। इस ज्ञान के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति अज्ञान में रहता है और सारे समाज में वंचकों और वंचितों की भरमार हो जाती है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥