श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 1

 
श्लोक
ब्राह्मण उवाच
दुरत्ययेऽध्वन्यजया निवेशितो
रजस्तम:सत्त्वविभक्तकर्मद‍ृक् ।
स एष सार्थोऽर्थपर: परिभ्रमन्
भवाटवीं याति न शर्म विन्दति ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
ब्राह्मण: उवाच—ब्राह्मण जड़ भरत ने कहा; दुरत्यये—जिसको पार करना कठिन है, दुर्गम; अध्वनि—सकाम कर्मों के पथ पर (इस जन्म में कर्म करना, इन कर्मों के आधार पर अगले जन्म में शरीर ग्रहण करना और इस प्रकार जन्म-मरण के चक्र को स्वीकार करना); अजया—माया के द्वारा, श्रीभगवान् की बहिरंगा शक्ति; निवेशित:—सन्निविष्ट; रज:-तम:-सत्त्व-विभक्त- कर्म-दृक्—बद्ध आत्मा जो लाभप्रद कर्मों तथा उनके फलों को तुरन्त देख लेता है जो सतो, रजो तथा तमो गुणों द्वारा तीन समूहों में विभक्त है; स:—वह; एष:—यह; स-अर्थ:—सकाम; अर्थ-पर:—धन प्राप्ति में तुला हुआ; परिभ्रमन्—सर्वत्र घूमते हुए; भव-अटवीम्—भव नामक जंगल अर्थात् जन्म-मरण का चक्र; याति—प्रवेश करता है; न—नहीं; शर्म—सुख; विन्दति—प्राप्त करता है ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्म-साक्षात्कार-प्राप्त जड़ भरत ने आगे कहा—हे राजा रहूगण, जीवात्मा इस संसार के दुर्लंघ्य पथ पर घूमता रहता है और बारम्बार जन्म तथा मृत्यु स्वीकार करता है। प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज तथा तम) के प्रभाव से इस संसार के प्रति आकृष्ट होकर जीवात्मा प्रकृति के जादू से केवल तीन प्रकार के फल जो शुभ, अशुभ तथा शुभाशुभ होते हैं देख पाता है। इस प्रकार वह धर्म, आर्थिक विकास, इन्द्रियतृप्ति तथा मुक्ति की अद्वैत भावना (परमात्मा में तादात्म्य) के प्रति आसक्त हो जाता है। वह उस वणिक के समान अहर्निश कठोर श्रम करता है जो कुछ सामग्री प्राप्त करने औरउससे लाभ उठाने के उद्देश्य से जंगल में प्रवेश करता है। किन्तु उसे इस संसार में वास्तविक सुख उपलब्ध नहीं हो पाता।
 
तात्पर्य
 यह सरलता से समझ में आता है कि इन्द्रियतृप्ति का मार्ग कितना कठिन तथा दुर्लंघ्य है। इस मार्ग को न जानने के कारण मनुष्य विभिन्न देहों में पुन: पुन: जन्म धारण करता है। इससे उसे इस संसार में कष्ट उठाना पड़ता है। इस जीवन में कोई यह सोचकर भले प्रसन्न होले कि वह अमरीकी, भारतीय, अंग्रेज या जर्मन है, किन्तु अगले जन्म में उसे चौरासी लाख योनियों में कोई दूसरा शरीर धारण करना होगा। अगला
शरीर कर्म के अनुसार तुरन्त प्राप्त होगा। तब उसे वही शरीर स्वीकार करना होगा—किसी प्रकार के प्रतिकार से लाभ नहीं होगा। प्रकृति का यह कठोर नियम है। अविद्यावश जीवात्मा को अपना परम आनन्दमय जीवन ज्ञात नहीं रहता जिससे वह माया के प्रभाव से भौतिक विषयों के प्रति आकृष्ट होता है। इस संसार में उसे कभी भी सुख नहीं मिल पाता, किन्तु वह उसी के लिए अत्यधिक श्रम करता है। यही माया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥