श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 10

 
श्लोक
कर्हि स्म चित्क्षुद्ररसान् विचिन्वं-
स्तन्मक्षिकाभिर्व्यथितो विमान: ।
तत्रातिकृच्छ्रात्प्रतिलब्धमानो
बलाद्विलुम्पन्त्यथ तं ततोऽन्ये ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
कर्हि स्म चित्—कभी-कभी; क्षुद्र—अत्यन्त लघु; रसान्—रति सुख; विचिन्वन्—ढूँढने के लिए; तत्—उन स्त्रियों का; मक्षिकाभि:—मधुमक्खियों से अथवा पतियों या कुटुम्बियों से; व्यथित:—अत्यन्त दुखी; विमान:—अपमानित; तत्र—वहाँ पर; अति—अत्यन्त; कृच्छ्रात्—धन के व्यय के कारण कठिनाई से; प्रतिलब्धमान:—रति सुख प्राप्त करके; बलात्—बलपूर्वक; विलुम्पन्ति—अपहरण की गई; अथ—तत्पश्चात्; तम्—इन्द्रिय सुख की वस्तु (स्त्री); तत:—उससे; अन्ये—अन्य व्यभिचारी (कामी) ।.
 
अनुवाद
 
 कभी-कभी थोड़े से रति-सुख के लिए मनुष्य चरित्रहीन स्त्री की खोज करता रहता है। इस प्रयास में उस स्त्री के सम्बन्धियों द्वारा उसका अपमान एवं प्रताडऩ होता है। यह वैसा ही है जैसा कि मधुमक्खी के छत्ते से शहद (मधु) निकालते समय मक्खियाँ आक्रमण कर दें। कभी-कभी प्रचुर धन व्यय करने पर उसे कुछ अतिरिक्त इन्द्रिय भोग के लिए दूसरी स्त्री प्राप्त हो सकती है। किन्तु दुर्भाग्यवश इन्द्रिय सुख की सामग्री रूप वह स्त्री चली जाती है, अथवा किसी अन्य कामी द्वारा अपहरण कर ली जाती है।
 
तात्पर्य
 बड़े-बड़े जंगलों में मधुमक्खी के छत्ते बड़े महत्व के होते हैं। प्राय: लोग वहाँ जाकर छत्तों से मधु एकत्र करते हैं, कभी-कभी मक्खियाँ आक्रमण करके उन्हें दण्डित भी करती हैं। मनुष्य समाज में जो लोग कृष्णभावनाभावित नहीं हैं, वे भौतिक जीवन के जंगल में विषयी जीवन के मधु के लोभ के कारण रहते हैं। ऐसे कामी पुरुष कभी भी एक पत्नी से सन्तुष्ट नहीं होते। उन्हें अनेक स्त्रियाँ चाहिए। प्रतिदिन वे अत्यन्त कठिनाई से ऐसी स्त्रियाँ प्राप्त करने का प्रयास करते हैं और इस प्रकार का मधु चखने के प्रयास में उन पर कभी-कभी उस स्त्री के परिजनों का प्रहार भी हो जाता है और बड़ी ताडऩा पड़ती है। भले ही
घूस देकर संभोग के लिए कोई अन्य स्त्री पा ले, किन्तु दूसरा कामी उसका अपहरण कर सकता है अथवा कुछ अधिक मूल्यवान और अच्छी वस्तु का प्रलोभन दे सकता है। भौतिक संसार रूपी जंगल में इस प्रकार का स्त्री-मृगया चलता रहता है, जो कभी वैध होता है, तो कभी अवैध। फलत: इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन में भक्तों के लिए अवैध स्त्री-पुरुष संग वर्जित है। इससे वे अनेक विपत्तियों से बचे रहते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी विवाहिता पत्नी से ही तुष्ट रहे। वह अपने विषयों की तृप्ति अपनी पत्नी से कर सकता है। इससे समाज में कुव्यवस्था भी नहीं उत्पन्न होगी और ऐसा करने के कारण उसे दण्डित भी नहीं होना पड़ेगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥