श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 12

 
श्लोक
क्‍वचित्‍क्‍वचित्क्षीणधनस्तु तस्मिन्
शय्यासनस्थानविहारहीन: ।
याचन् परादप्रतिलब्धकाम:
पारक्यद‍ृष्टिर्लभतेऽवमानम् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
क्वचित् क्वचित्—कभी-कभी; क्षीण-धन:—धनहीन होने पर; तु—लेकिन; तस्मिन्—उस जंगल में; शय्या—लेटने का बिस्तर; आसन—बैठने का स्थान; स्थान—आवास; विहार—परिवार सहित सुखोपभोग; हीन:—विहीन होकर; याचन्—भीख माँग कर; परात्—अन्यों (मित्रों तथा सम्बधियों) से; अप्रतिलब्ध-काम:—कामना की पूर्ति न होने से; पारक्य-दृष्टि:—अन्यों की सम्पत्ति का लालची; लभते—प्राप्त करता है; अवमानम्—अनादर ।.
 
अनुवाद
 
 संसार के जंगली मार्ग में कभी-कभी व्यक्ति धनहीन हो जाता है, जिसके कारण उसके पास न समुचित घर न बिस्तर या बैठने का स्थान होता है, न ही समुचित पारिवारिक सुख ही उपलब्ध हो पाता है। अत: वह अन्यों से धन माँगता है, किन्तु जब माँगने पर भी उसकी इच्छाएँ अपूर्ण रहती हैं, तो वह या तो उधार लेना चाहता है या फिर अन्यों की सम्पत्ति चुराना चाहता है। इस तरह वह समाज में अपमानित होता है।
 
तात्पर्य
 इस संसार में भीख माँगने, उधार लेने या चुराने के सिद्धान्त अत्यन्त उपयुक्त हैं। जब किसी को आवश्यकता पड़ती है, तो वह माँगता, उधार लेता या फिर चोरी करता है। यदि माँगने से काम नहीं चलता तो वह उधार लेता है। यदि उधार अदा नहीं कर पाता तो वह चोरी करता है और
जब पकड़ा जाता है, तो अपमानित होता है। यह इस संसार का नियम है। कोई भी मनुष्य ईमानदारी से जीवित नहीं रह सकता, अत: मनुष्य छल करके, माँग करके, उधार ले करके या चोरी करके अपनी तृप्ति करना चाहता है। इस तरह इस संसार में कोई भी शान्तिपूर्वक नहीं रह रहा है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥