श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 13

 
श्लोक
अन्योन्यवित्तव्यतिषङ्गवृद्ध-
वैरानुबन्धो विवहन्मिथश्च ।
अध्वन्यमुष्मिन्नुरुकृच्छ्रवित्त-
बाधोपसर्गैर्विहरन् विपन्न: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
अन्योन्य—एक दूसरे से; वित्त-व्यतिषङ्ग—धन के लेन-देन द्वारा; वृद्ध—बढ़ा हुआ; वैर-अनुबन्ध:—वैर भाव; विवहन्— कभी-कभी ब्याह द्वारा; मिथ:—परस्पर; च—तथा; अध्वनि—संसार-पथ पर; अमुष्मिन्—वह; उरु-कृच्छ्र—कठिनाइयों से; वित्त-बाध—धन की कमी से; उपसर्गै:—रोगों से; विहरन्—घूमते हुए; विपन्न:—अत्यन्त चिन्तित हो जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 आर्थिक लेने-देन के कारण सम्बन्धों में कटुता उत्पन्न होती है, जिसका अन्त शत्रुता में होता है। कभी पति-पत्नी भौतिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होते हैं और अपने सम्बन्ध बनाये रखने के लिए वे कठोर श्रम करते हैं, तो कभी धनाभाव अथवा रुग्ण दशा के कारण वे अत्यधिक चिन्तित रहकर मरणासन्न हो जाते हैं।
 
तात्पर्य
 इस संसार में मनुष्यों तथा समाजों, यहाँ तक कि राष्ट्रों के बीच अनेक प्रकार के पारस्परिक लेन-देन चलते हैं। किन्तु इनका अन्त दोनों पक्षों की शत्रुता में होता है। इसी प्रकार विवाह-सम्बन्ध में आर्थिक लेन-देन के कारण घातक परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इससे मनुष्य या तो बीमार पड़ जाता है
या आर्थिक रूप से चिन्तित रहने लगता है। आधुनिक युग में अधिकांश देशों का आर्थिक विकास हुआ है, किन्तु व्यापारिक लेन-देन के कारण सम्बन्धों में तनाव आया है। अन्त में राष्ट्रों के बीच युद्ध छिड़ जाता है। इस उथल-पुथल से समूचे विश्व का विनाश होता है और लोगों को अत्यधिक कष्ट उठाना पड़ता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥