श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 14

 
श्लोक
तांस्तान् विपन्नान् स हि तत्र तत्र
विहाय जातं परिगृह्य सार्थ: ।
आवर्ततेऽद्यापि न कश्चिदत्र
वीराध्वन: पारमुपैति योगम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
तान् तान्—उन सबों को; विपन्नान्—विभिन्न प्रकार से व्यथित; स:—जीव; हि—निश्चय ही; तत्र तत्र—यहाँ-वहाँ; विहाय— छोडक़र; जातम्—नवजातों को, नये पैदा हुओं को; परिगृह्य—लेकर; स-अर्थ:—अपने हित की खोज में जीव; आवर्तते— जंगल में घूमता रहता है; अद्य अपि—आज तक; न—नहीं; कश्चित्—कोई भी; अत्र—यहाँ इस जंगल में; वीर—हे वीर; अध्वन:—भौतिक जीवन का मार्ग; पारम्—अन्त; उपैति—पाता है; योगम्—श्रीभगवान् की भक्ति-साधना ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, भौतिक जीवन रूपी जंगल के मार्ग में मनुष्य पहले अपने पिता तथा माता को खोता है और उनकी मृत्यु के बाद वह नवजात बच्चों से आसक्त हो जाता है। इस तरह वह भौतिक प्रगति के मार्ग में घूमता रहता है और अन्त में अत्यन्त व्यथित हो जाता है। किसी को मृत्यु के क्षण तक यह पता नहीं चल पाता कि वह उससे किस प्रकार निकले।
 
तात्पर्य
 इस संसार में गृहस्थ जीवन संभोग-संस्थान है। यन्मैथुनादि गृहमेधिसुखम् (भागवत ७.९.४५)। माता-पिता के संभोग से संतान उत्पन्न होती है, सन्तानों का ब्याह होता है और वे भी उसी विषयी-जीवन का पालन करते हैं, उनके भी संतानें होती हैं। इस प्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी भौतिक जीवन के कष्टों से मुक्ति के लिए यही क्रम चलता रहता है। इनमें से कोई भी उस ज्ञान तथा
वैराग्य के मार्ग को अंगीकार नहीं करता जिसका अन्त भक्तियोग में होता है। वास्तव में मनुष्य जीवन तो ज्ञान और वैराग्य के लिए ही होता है। इन्हीं के माध्यम से भक्ति प्राप्त हो सकती है। दुर्भाग्यवश इस युग के लोग साधु-संग से कतराते हैं और पिटा-पिटाया गृहस्थ जीवन बिताते हैं। इस तरह वे धन तथा विषय-कर्मों के आदान-प्रदान से पीडि़त रहते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥