श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 15

 
श्लोक
मनस्विनो निर्जितदिग्गजेन्द्रा
ममेति सर्वे भुवि बद्धवैरा: ।
मृधे शयीरन्न तु तद्‌व्रजन्ति
यन्न्यस्तदण्डो गतवैरोऽभियाति ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
मनस्विन:—बड़े-बड़े वीर पुरुष (विचारक); निर्जित-दिक्-गजेन्द्रा:—जिन्होंने हाथियों के समान बलशाली वीरों को जीत लिया है; मम—मेरा (मेरा देश, मेरी भूमि, मेरा परिवार, मेरा धर्म); इति—इस प्रकार; सर्वे—समस्त (महान् राजनैतिक, सामाजिक तथा धार्मिक नेता); भुवि—इस संसार में; बद्ध-वैरा:—परम्परा से वैरभाव उत्पन्न कर रखा है; मृधे—युद्ध में; शयीरन्—भूमि में मृत होकर गिरे हुए; न—नहीं; तु—लेकिन; तत्—श्रीभगवान् का धाम; व्रजन्ति—पहुँचते हैं; यत्—जो; न्यस्त-दण्ड:—संन्यासी; गत-वैर:—जिसका विश्व भर में किसी से वैर-भाव नहीं है; अभियाति—उस सिद्धि को प्राप्त करता है ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसे अनेक राजनैतिक तथा सामाजिक वीर पुरुष हैं और थे जिन्होंने सम-शक्ति वाले शत्रुओं पर विजय प्राप्त की है, तो भी वे अज्ञानवश यह विश्वास करके कि यह भूमि उनकी है परस्पर लड़ते हैं और युद्धभूमि में अपने प्राण गँवाते हैं। वे सन्यासियों के द्वारा स्वीकृत आध्यात्मिक पथ को ग्रहण कर सकने में अक्षम रहते हैं। वीर पुरुष तथा राजनैतिक नेता होते हुए भी वे आत्म- साक्षात्कार का पथ नहीं अपना सकते हैं।
 
तात्पर्य
 बड़े-बड़े राजनीतिक नेता भले ही अपने समान शक्तिशाली राजनीतिक शत्रुओं को परास्त कर दें, किन्तु वे अहर्निश साथ रहने वाले प्रबल इन्द्रिय-रूपी शत्रुओं का दमन नहीं कर पाते। इन निकटस्थ शत्रुओं को न जीत सकने के कारण ही वे अन्य शत्रुओं को जीतने का प्रयास करते रहते हैं और अन्तत: जीवन-संघर्ष में मर जाते हैं। वे न तो आत्म-साक्षात्कार का पथ ग्रहण करते
हैं और न संन्यासी ही बनते हैं। कभी-कभी ये महान् नेता संन्यासी का वेश धारण करके अपने आपको महात्मा कहलवाने लगते हैं, किन्तु उनका एकमात्र प्रयोजन अपने राजनीतिक शत्रुओं को परास्त करना रहता है। चूँकि वे अपने जीवन को “यह मेरा है” के मोह से भ्रष्ट कर चुके होते हैं, अत: न उनकी आत्म- उन्नति हो पाती है और न वे माया के चंगुल से मुक्त हो पाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥