श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 16

 
श्लोक
प्रसज्जति क्‍वापि लताभुजाश्रय-
स्तदाश्रयाव्यक्तपदद्विजस्पृह: ।
क्‍वचित्कदाचिद्धरिचक्रतस्त्रसन्
सख्यं विधत्ते बककङ्कगृध्रै: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
प्रसज्जति—अधिकाधिक आसक्त होता है; क्वापि—कभी-कभी; लता-भुज-आश्रय:—जो पत्नी की लताओं जैसी कोमल बाहों में आश्रय लेते हैं; तत्-आश्रय—जो ऐसी लताओं द्वारा आश्रय प्रदान किये जाते हैं; अव्यक्त-पद—जो अस्पष्ट पद (गीत) गाते हैं; द्विज-स्पृह:—पक्षियों का गाना सुनने का इच्छुक; क्वचित्—कभी-कभी; कदाचित्—कहीं; हरि-चक्रत: त्रसन्—सिंह की दहाड़ से भयभीत; सख्यम्—मित्रता; विधत्ते—करता है; बक-कङ्क-गृध्रै:—बगुलों, सारसों तथा गीधों के साथ ।.
 
अनुवाद
 
 कभी-कभी जीवात्मा संसार रूपी जंगल में लताओं का आश्रय लेता है और उन लताओं में बैठें पक्षियों की चहचहाहट सुनना चाहता है। जंगल के सिंहों की दहाड़ से भयभीत होकर वह बगुलों, सारसों तथा गृद्धों से मैत्री स्थापित करता है।
 
तात्पर्य
 इस संसार रूपी जंगल में अनेक प्रकार के पशु, पक्षी, वृक्ष तथा लताएँ होती हैं। कभी- कभी जीवात्मा लताओं का आश्रय लेना चाहता है, अर्थात् वह लताओं के समान भुजाओं वाली अपनी स्त्री का आलिंगन करके सुखी रहना चाहता है। इन लताओं में चहकने वाले अनेक पक्षी रहते हैं— इससे यह सूचित होता है कि वह अपनी पत्नी की मधुरवाणी सुनकर सन्तुष्ट होना चाहता है। किन्तु वृद्धावस्था में वह कभी कभी सन्निकट-मृत्यु से भयभीत हो उठता है, जिसकी तुलना दहाड़ते सिंह से की गई है। सिंह के आक्रमण से बचने के लिए वह किन्हीं धूर्त स्वामियों, योगियों, अवतारों, वंचकों की शरण में जाता है। इस प्रकार माया के द्वारा पथभ्रष्ट होकर वह अपना जीवन विनष्ट कर लेता है।
कहा गया है—हरिं विना मृतिं न तरन्ति—श्रीभगवान् की शरण लिए बिना कोई भी मृत्यु के आसन्न भय से बच नहीं सकता। यहाँ हरि शब्द से सिंह तथा श्रीभगवान् दोनों का बोध होता है। हरि अर्थात् मृत्यु रूपी सिंह से बचने के लिए हरि (ईश्वर) की शरण लेनी होती है। किन्तु अल्पज्ञानी लोग मृत्यु के चंगुल से बचने के लिए अभक्त वंचकों की शरण में जाते हैं। इस संसार रूपी जंगल में जीवात्मा सबसे पहले अपनी पत्नी की भुजवल्लरियों की शरण में जाकर उसकी मधुरवाणी सुनना चाहता है। बाद में वह कभी कभी तथाकथित गुरुओं तथा साधुओं की शरण ग्रहण करता है जो बगुलों, सारसों तथा गीधों के समान हैं। इस प्रकार परमेश्वर की शरण में न जाने से वह दोनों ओर ठगा जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥