श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 18

 
श्लोक
द्रुमेषु रंस्यन् सुतदारवत्सलो
व्यवायदीनो विवश: स्वबन्धने ।
क्‍वचित्प्रमादाद् गिरिकन्दरे पतन्
वल्लीं गृहीत्वा गजभीत आस्थित: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
द्रुमेषु—वृक्षों में (अथवा वृक्षवत् घरों में जिनमें बन्दर एक डाली से दूसरी डाली पर कूदते रहते हैं); रंस्यन्—भोगता हुआ; सुत दार-वत्सल:—बच्चों तथा पत्नी के प्रति अनुरक्त; व्यवाय-दीन:—विषय भोग के कारण दुर्बल हृदय वाला; विवश:—त्यागने में अक्षम; स्व-बन्धने—कर्मफल के बन्धन में; क्वचित्—कभी-कभी; प्रमादात्—आसन्न मृत्यु के भय से; गिरि-कन्दरे—पर्वत की गुफा में; पतन्—गिरकर; वल्लीम्—लताओं की शाखाएँ; गृहीत्वा—पकडक़र; गज-भीत:—मृत्यु रूपी हाथी से भयभीत; आस्थित:—उस स्थिति में रहा जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब जीवात्मा एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूदने वाले बन्दर के सदृश बन जाता है, तो गृहस्थ जीवन के वृक्ष में मात्र विषय सुख (संभोग) के लिए रहता है। इस प्रकार वह अपनी पत्नी से वैसे ही पाद-प्रहार पाता है जैसे कि गधा गधी से। मुक्ति का साधन न पाने के कारण वह असहाय बनकर उसी अवस्था में रहता है। कभी-कभी उसे असाध्य रोग हो जाता है जो पर्वत की गुफा में गिरने जैसा है। वह इस गुफा के पीछे रहने वाले मृत्यु रूपी हाथी से भयभीत हो उठता है और लताओं की टहनियाँ पकड़े रहकर लटका रहता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर गृहस्थ के जीवन की भयावह स्थिति का वर्णन है। गृहस्थ का जीवन कष्टों से परिपूर्ण है और उसका एकमात्र आकर्षण अपनी पत्नी से संभोग रहता है जो उस रति-क्रीड़ा के समय गधी के समान पाद-प्रहार
करती है। निरन्तर विषयी जीवन बिताने से उसे अनेक असाध्य रोग हो जाते हैं। उस समय, हाथी रूपी मृत्यु से भयभीत होकर वह वृक्षों की शाखाएँ पकड़ कर बन्दर के समान लटका रहता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥