श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 19

 
श्लोक
अत: कथञ्चित्स विमुक्त आपद:
पुनश्च सार्थं प्रविशत्यरिन्दम ।
अध्वन्यमुष्मिन्नजया निवेशितो
भ्रमञ्जनोऽद्यापि न वेद कश्चन ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
अत:—इससे; कथञ्चित्—कुछ भी; स:—वह; विमुक्त:—मुक्त; आपद:—विपत्ति से; पुन: च—फिर से; स-अर्थम्—जीवन में रुचि लेता हुआ; प्रविशति—प्रवेश करता है, प्रारम्भ करता है; अरिम्-दम—शत्रुओं के हंता, हे राजन्; अध्वनि—भोग-पथ पर; अमुष्मिन्—उस; अजया—माया के प्रभाव से; निवेशित:—डूबा हुआ; भ्रमन्—घूमते हुए; जन:—बद्धजीव; अद्य अपि—मृत्यु तक; न वेद—नहीं जानता; कश्चन—कुछ भी ।.
 
अनुवाद
 
 हे शत्रुओं के संहारक, महाराज रहूगण, यदि बद्धजीव किसी प्रकार से इस भयानक स्थिति से उबर आता है, तो वह पुन: विषयी जीवन बिताने के लिए अपने घर को लौट जाता है, क्योंकि वही आसक्ति का मार्ग है। इस प्रकार ईश्वर की माया से वशीभूत वह संसार रूपी जंगल में घूमता रहता है। मृत्यु के निकट पहुँच कर भी उसे अपने वास्तविक हित का पता नहीं चल पाता।
 
तात्पर्य
 यही सांसारिक जीवन की रीति है। जब कोई विषयों के प्रति आकृष्ट होता है, तो वह अनेक प्रकार से बँध जाता है और अपने जीवन का सही लक्ष्य नहीं समझ पाता। अत: श्रीमद्भागवत का (७.५.३१) कथन है—न ते विदु: स्वार्थगतिं हि विष्णुम्—सामान्यत: लोग जीवन के चरम उद्देश्य को नहीं समझ पाते। जैसाकि वेदों में कहा गया
है—ॐ तद् विष्णो: परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरय:— जो आत्मज्ञानी हैं, वे केवल विष्णु के चरणकमलों को देखते हैं। किन्तु बद्धजीव विष्णु के साथ अपने सम्बन्ध को पुन:स्थापित करने में कोई रुचि न रखकर भौतिक विषयों में फँस जाता है और तथाकथित नेताओं द्वारा पथभ्रष्ट होकर अखण्ड बन्धन में रहता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥