श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 20

 
श्लोक
रहूगण त्वमपि ह्यध्वनोऽस्य
सन्न्यस्तदण्ड: कृतभूतमैत्र: ।
असज्जितात्मा हरिसेवया शितं
ज्ञानासिमादाय तरातिपारम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
रहूगण—हे राजा रहूगण; त्वम्—तुम; अपि—भी; हि—निश्चय ही; अध्वन:—संसार पथ का; अस्य—इस; सन्न्यस्त-दण्ड:— अपराधियों को दण्ड देने वाले राज-दण्ड को त्याग कर; कृत-भूत-मैत्र:—प्रत्येक प्राणी के मित्र बन कर; असत्-जित- आत्मा—जिसका मन जीवन के भौतिक सुख के प्रति आकृष्ट नहीं होता; हरि-सेवया—परमेश्वर की प्रेममय सेवा के द्वारा; शितम्—पैनी; ज्ञान-असिम्—ज्ञान की तलवार; आदाय—हाथ में लेकर; तर—पार करो; अति-पारम्—उस अन्तिम छोर को (दूसरे पार) ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा रहूगण, तुम भी भौतिक सुख के प्रति आकर्षण-मार्ग में स्थित होकर माया के शिकार हो। मैं तुम्हें राज पद तथा उस दण्ड का जिससे अपराधियों को दण्डित करते हो परित्याग करने की सलाह देता हूँ जिससे तुम समस्त जीवात्माओं के सुहृद (मित्र) बन सको। विषयभोगों को त्याग कर अपने हाथ में भक्ति के द्वारा धार लगायी गयी ज्ञान की तलवार को धारण करो। तब तुम माया की कठिन ग्रंथि को काट सकोगे और अज्ञानता के सागर को पार करके दूसरे छोर पर जा सकोगे।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (१५.३-४) में भगवान् कृष्ण ने इस संसार की तुलना मोह के वृक्ष से की है, जिससे प्रत्येक प्राणी को छूटना है—
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।

अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्वा ॥

तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय:।

तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी ॥

“इस वृक्ष का असली रूप इस संसार में नहीं देखा जा सकता। इसके आदि, अन्त अथवा मूलाधार को कोई नहीं जान सकता। किन्तु इस संसार-वृक्ष को दृढ़ निश्चय के साथ वैराग्य रूपी शस्त्र से काट कर फिर उस परमपद को खोजना चाहिए जिसे प्राप्त करके इस संसार में फिर वापस नहीं आना पड़ता। इसके लिए उन्हीं आदि पुरुष पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के शरणागत हुआ जाये जिनसे अनादिकाल से प्रत्येक वस्तु का सूत्रपात तथा विस्तार होता आया है।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥