श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 21

 
श्लोक
राजोवाच
अहो नृजन्माखिलजन्मशोभनं
किं जन्मभिस्त्वपरैरप्यमुष्मिन् ।
न यद्‌धृषीकेशयश:कृतात्मनां
महात्मनां व: प्रचुर: समागम: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
राजा उवाच—राज रहूगण ने कहा; अहो—ओह; नृ-जन्म—मनुष्य का जन्म लेने वाले तुम; अखिल-जन्म-शोभनम्—सर्व योनियों में श्रेष्ठ; किम्—क्या आवश्यकता; जन्मभि:—स्वर्ग लोकों के देवता जैसी उच्चयोनि में जन्म लेने से; तु—लेकिन; अपरै:—अन्यान्य, निकृष्ट; अपि—निस्संदेह; अमुष्मिन्—अगले जन्म में; न—नहीं; यत्—जो; हृषीकेश-यश:—समस्त इन्द्रियों के स्वामी श्रीभगवान् हृषीकेश के पवित्र यश से; कृत-आत्मनाम्—जिनके हृदय विमल हैं, शुद्ध अन्त:करण वाले; महा- आत्मनाम्—महात्माओं की; व:—हम सबकी; प्रचुर:—अत्यधिक; समागम:—संगति ।.
 
अनुवाद
 
 राज रहूगण ने कहा—यह मनुष्य जन्म समस्त योनियों में श्रेष्ठ है। यहाँ तक कि स्वर्ग में देवताओं के बीच जन्म लेना उतना यशपूर्ण नहीं जितना कि इस पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लेना। तो फिर देवता जैसे उच्च पद का क्या लाभ? स्वर्गलोक में अधाह भोग-सामग्री के कारण देवताओं को भक्तों की संगति का अवसर ही नहीं मिलता।
 
तात्पर्य
 आत्म-साक्षात्कार के लिए मनुष्य जन्म एक महान् सुअवसर होता है। चाहे कोई स्वर्गलोक में देवताओं के बीच जन्म क्यों न ले, किन्तु भौतिक सुविधाओं की प्रचुरता के कारण उसे भव-बन्धन से छुटकारा नहीं मिल पाता। इस पृथ्वी पर भी जो ऐश्वर्यवान हैं, वे कृष्ण-भक्ति की कोई परवाह नहीं करते। जो बुद्धिमान पुरुष वास्तव में भौतिकता के चंगुल से छूटना चाहता है उसे चाहिए कि वह शुद्ध भक्तों की संगति करे। इस संगति से वह क्रमश: धन तथा स्त्री के आकर्षण से विरक्त होता जाएगा। भौतिकता के मूलभूत तत्त्व धन तथा स्त्रियाँ हैं। अत: श्री चैतन्य महाप्रभु
ने यह उपदेश दिया है कि जो श्रीभगवान् के धाम को वापस जाना चाहते हैं उन्हें धन तथा स्त्री का परित्याग कर देना चाहिए जिससे वे ईश्वर के साम्राज्य में प्रवेश करने के योग्य बन सकें। धन तथा स्त्रियों का पूर्ण उपभोग ईश्वर की सेवा में किया जा सकता है और जो ऐसा कर सकता है, वह भव-बन्धन से मुक्त हो सकता है। सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायना: कथा: (भागवत ३.२५.२५)। भक्तों की संगति में रह कर ही श्रीभगवान् के यश का आस्वादन सम्भव है। विशुद्ध भक्त की किंचित संगति से मनुष्य श्रीभगवान् के धाम जाने में सफल हो सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥