श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 22

 
श्लोक
न ह्यद्भ‍ुतं त्वच्चरणाब्जरेणुभि-
र्हतांहसो भक्तिरधोक्षजेऽमला ।
मौहूर्तिकाद्यस्य समागमाच्च मे
दुस्तर्कमूलोऽपहतोऽविवेक: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निश्चय ही; अद्भुतम्—अद्भुत; त्वत्-चरण-अब्ज-रेणुभि:—आपके चरणकमलों की धूलि से; हत-अंहस:— पाप के फल से मुक्त मैं; भक्ति:—प्रेम तथा भक्ति; अधोक्षजे—श्रीभगवान् में, जो व्यवहार-ज्ञान की पकड़ से परे है; अमला— सांसारिक कल्मषों से रहित, विमल; मौहूर्तिकात्—क्षणिक; यस्य—जिसके; समागमात्—आगमन तथा संगति से; च—भी; मे—मेरा; दुस्तर्क—झूठ तर्कों का, कुतर्कों का; मूल:—मूल, मूलकारण; अपहत:—पूर्णतया विनष्ट हो गया; अविवेक:— अज्ञान ।.
 
अनुवाद
 
 यह कोई विचित्र बात नहीं है कि केवल आपके चरण-कमलों की धूलि से धूसरित होने से मनुष्य तुरन्त विशुद्ध भक्ति के अधोक्षज पद को प्राप्त होता है जो ब्रह्मा जैसे महान् देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। आपके क्षणमात्र के समागम से अब मैं समस्त तर्कों, अहंकार तथा अविवेक से मुक्त हो गया हूँ जो इस भौतिक जगत में बंधन के मूल कारण हैं। मैं अब इन समस्त झंझटों से मुक्त हूँ।
 
तात्पर्य
 शुद्ध भक्तों के समागम से भौतिक बंधनों से मुक्ति निश्चित है। यह जड़ भरत की संगति से राजा रहूगण के प्रसंग में पूर्णत: सत्य है। राजा रहूगण तुरन्त ही भौतिक संगति के दुष्परिणामों
से मुक्त हो गये। शुद्ध भक्तों द्वारा अपने शिष्यों को दिये तर्क इतने विश्वसनीय होते हैं कि मूढ़ से मूढ़ शिष्य भी तुरन्त आध्यात्मिक ज्ञान का आलोक प्राप्त कर सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥