श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 24

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
इत्येवमुत्तरामात: स वै ब्रह्मर्षिसुत: सिन्धुपतय आत्मसतत्त्वं विगणयत: परानुभाव: परमकारुणिकतयोपदिश्य रहूगणेन सकरुणमभिवन्दित चरण आपूर्णार्णव इव निभृतकरणोर्म्याशयो धरणिमिमां विचचार ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति एवम्—इस प्रकार; उत्तरा-मात:—हे माता उत्तरा के पुत्र, महाराज परीक्षित; स:—वह ब्राह्मण; वै—निस्संदेह; ब्रह्म-ऋषि-सुत:—अत्यन्त शिक्षित ब्राह्मण का पुत्र, जड़ भरत; सिन्धु-पतये—सिंधु राज्य के राजा को; आत्म-स-तत्त्वम्—आत्मा की वास्तविक स्वाभाविक स्थिति; विगणयत:—जड़ भरत का अपमान करने पर भी; पर-अनुभाव:—परम आत्मज्ञानी; परम-कारुणिकतया—पतित-आत्माओं के प्रति अत्यन्त दयालु होने के कारण; उपदिश्य—उपदेश देकर; रहूगणेन—राजा रहूगण के द्वारा; स-करुणम्—दीनभाव से; अभिवन्दित-चरण:—जिसके चरणकमलों की वन्दना की गई; आपूर्ण-अर्णव: इव—परिपूर्ण सागर के समान; निभृत—पूर्णतया शान्त; करण—इन्द्रियों की; ऊर्मि—लहरें; आशय:—अन्त:करण में; धरणिम्—पृथ्वी पर; इमाम्—इस; विचचार—घूमने लगे ।.
 
अनुवाद
 
 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा, हे राजन्, हे उत्तरा-पुत्र, राजा रहूगण द्वारा अपनी पालकी ढोये जाने के लिए बाध्य किये जाने से अपमानित होकर जड़ भरत के मन में असंतोष की कुछकुछ लहरें थीं, किन्तु उन्होंने इनकी उपेक्षा की और उनका हृदय पुन: सागर के समान शान्त हो गया। यद्यपि राजा रहूगण ने उनका अपमान किया, किन्तु वे महान् परमहंस थे। वैष्णव होने के नाते वे परम दयालु थे, अत: उन्होंने राजा को आत्मा की वास्तविक स्वाभाविक स्थिति बतलाई। तब उन्हें अपमान भूल गया, क्योंकि राजा रहूगण ने विनीत भाव से उनके चरणकमलों पर क्षमा माँग ली थी। इसके बाद वे पुन: पूर्ववत् सारे विश्व का भ्रमण करने लगे।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत (३.२५.२१) में कपिलदेव ने महापुरुषों के लक्षण बतलाये हैं—तितिक्षव: कारुणिका: सुहृद: सर्वदेहिनाम्। साधु भक्त अन्यन्त सहिष्णु होता है। वह सभी जीवों का मित्र होता है और संसार में वैर नहीं पालता। शुद्ध भक्त में साधु के समस्त गुण पाये जाते हैं। जड़ भरत इसके उदाहरण हैं। भौतिक शरीर होने से जब राजा रहूगण द्वारा उनका अपमान हुआ तो वे विक्षुब्ध अवश्य हुए थे, किन्तु बाद में राजा के अनुनय-विनय से
जड़ भरत ने उसे क्षमा कर दिया। जो कोई भी श्रीभगवान् के धाम को वापस जाना चाहता है उसका परम कर्तव्य है कि वह राजा रहूगण के समान विनीत हो और जिस वैष्णव का अपमान किया हो उससे क्षमा माँगे। वैष्णव सामान्य रूप से परम दयालु होते हैं, अत: जब कोई उनके चरणों में तुरन्त समर्पण कर देता है, तो वे उनके पापकर्म के फल को क्षमा कर देते हैं। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो पापकर्म के फल बने रहते हैं और फल अच्छा नहीं निकलता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥