श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 3

 
श्लोक
प्रभूतवीरुत्तृणगुल्मगह्वरे
कठोरदंशैर्मशकैरुपद्रुत: ।
क्‍वचित्तु गन्धर्वपुरं प्रपश्यति
क्‍वचित्‍क्‍वचिच्चाशुरयोल्मुकग्रहम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
प्रभूत—प्रचुर; वीरुत्—लताओं; तृण—घास के तिनकों; गुल्म—घने जंगलों के; गह्वरे—कुंजों में; कठोर—क्रूर; दंशै:— काटने से; मशकै:—मच्छरों के द्वारा; उपद्रुत:—विक्षुब्ध; क्वचित्—कभी-कभी; तु—लेकिन; गन्धर्व-पुरम्—गन्धर्वों द्वारा बनाया गया मिथ्या स्थान, कल्पित गन्धर्वपुरी; प्रपश्यति—देखता है; क्वचित्—(तथा) कभी-कभी; क्वचित्—कभी-कभी; च—तथा; आशु-रय—अत्यन्त तेजी से; उल्मुक—उल्का के तुल्य; ग्रहम्—भूतप्रेत, पिशाच ।.
 
अनुवाद
 
 इस जंगल में झाडिय़ों, घास तथा लताओं के झाड़-झंखाड़ से बने सघन कुंजों में बुरी तरह से काटने वाले मच्छरों (ईर्ष्यालु पुरुषों) के होने से बद्धजीव निरन्तर परेशान रहता है। कभी कभी उसे जंगल में काल्पनिक महल (गन्धर्वपुर) दिखता है, तो कभी कभी वह आसमान से टूटते उल्का के समान प्रेत को देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है।
 
तात्पर्य
 भौतिक घर वस्तुत: सकाम कर्म का छिद्र है। जीविकोपार्जन के लिए मनुष्य नाना प्रकार के उद्योगों एवं व्यापारों में अपने को लगाता है और स्वर्गलोक जाने के लिए कभी-कभी बड़े-बड़े यज्ञ करता है। इस के साथ ही साथ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी धंधे में लग कर अपनी जीविका कमाने में लगा रहता है। इन कार्यों में अनेक अवांछित लोगों से पाला पड़ता है जिनका आचरण मच्छरों के दंश के समान कहा जा सकता है। इससे विषम परिस्थितियाँ
उत्पन्न होती हैं। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य विशाल आवास बनाने और स्थायी रूप से जीवन बिताने की कल्पना करता रहता है, किन्तु यह सम्भव नहीं हो पाता। स्वर्ण की उपमा उस प्रेत से दी गई है जो आकाश में टूटे हुए उल्का की तरह दिखाई देता है। वह एक क्षण के लिए दृष्टिगोचर होकर छिप जाता है। सामान्यत: कर्मी स्वर्ण या सम्पत्ति से आकर्षित होते हैं यहाँ उनकी उपमा भूतप्रेत तथा पिशाचिनियों से दी गई है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥