श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 4

 
श्लोक
निवासतोयद्रविणात्मबुद्धि-
स्ततस्ततो धावति भो अटव्याम् ।
क्‍वचिच्च वात्योत्थितपांसुधूम्रा
दिशो न जानाति रजस्वलाक्ष: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
निवास—आवास; तोय—जल; द्रविण—सम्पत्ति; आत्म-बुद्धि:—जो भौतिक वस्तुओं को आत्मा या स्वयं मानता है; तत: तत:—इधर-उधर; धावति—दौड़ता है; भो:—हे राजा; अटव्याम्—इस संसार रूपी जंगल-मार्ग पर; क्वचित् च—तथा कभी- कभी; वात्या—बवंडर से; उत्थित—ऊपर उठ कर; पांसु—धूलि से; धूम्रा:—धुंएँ के रंग का प्रतीत होता है; दिश:—दिशाएँ; न—नहीं; जानाति—जानता है; रज:-वल-अक्ष:—हवा की धूल से ढकी हुई आँखों वाला अथवा जो रजस्वला पत्नी के प्रति आकृष्ट है ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, इस संसार रूपी जंगल के मार्ग में घर, सम्पत्ति, कुटुम्बी इत्यादि से भ्रमित बुद्धि वाला वणिक सफलता की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान को दौड़ता रहता है। कभी-कभी उसकी आँखें बवंडर की धूल से ढक जाती हैं, अर्थात् कामवश वह अपनी स्त्री की सुन्दरता के प्रति, उसे विशेष रूप से रजोकाल में, मुग्ध हो जाता है। इस प्रकार अन्धा होने से उसे यह नहीं दिखाई पड़ता कि उसे कहाँ जाना है, अथवा वह क्या कर रहा है।
 
तात्पर्य
 कहा गया है कि गृहस्थ जीवन का सारा आकर्षण पत्नी में केन्द्रित होता है, क्योंकि संभोग ही गृहस्थ जीवन का केन्द्र-बिन्दु है—यन्मैथुनादि-गृहमेधि-सुखं हि तुच्छम्। भौतिकतावादी पुरुष स्त्री को केन्द्र बनाकर अहर्निश श्रम करता है। संभोग उसका एक-मात्र सुख है। इसीलिये कर्मी सदैव मित्र रूप में स्त्रियों के प्रति अथवा पत्नियों के प्रति आकृष्ट होते हैं। निस्सन्देह बिना संभोग के उनका काम नहीं चल पाता। ऐसी दशा में पत्नी की तुलना, विशेष रूप से जब वह रजस्वला होती है, बवंडर से की जाती है। जो गृहस्थाश्रम का नियमानुसार पालन करते हैं, वे माह में एक बार, रजोकाल के बाद, संभोग करते हैं। मनुष्य जैसे-जैसे इस अवसर की ताक में रहता है, उसकी आँखें अपनी पत्नी की सुन्दरता से सम्मोहित होती रहती हैं। अत: यह कहा गया है कि बवंडर आँखों को धूल से ढक देता है। ऐसा कामी पुरुष यह नहीं जानता कि उसके सारे व्यापार विभिन्न देवताओं द्वारा,
विशेष रूप से सूर्यदेव द्वारा, देखे जा रहे हैं और अगले जन्म के कर्मों के लिए उनका अंकन हो रहा है। ज्योतिष सम्बन्धी गणनाएँ ज्योतिशास्त्र कहलाती हैं। चूँकि इस जगत में ज्योति अथवा तेज विभिन्न नक्षत्रों तथा ग्रहों से प्राप्त होता है, इसलिए यह विज्ञान ज्योतिशास्त्र कहलाता है। ज्योति की गणनाओं से हमारे भविष्य का पता चल जाता है। दूसरे शब्दों में, समस्त ज्योतिपिंड—नक्षत्र, सूर्य तथा चन्द्रमा—हर एक बद्धजीव के व्यापारों को देखते रहते हैं। इसी के अनुसार उसे विशेष प्रकार का शरीर प्राप्त होता है। किन्तु कामी पुरुष की जिसकी आँखें भौतिक जगत के बवंडर की धूल से ढकी रहती हैं, यह कभी नहीं सोच पाता कि उसके समस्त व्यापारों का अवलोकन विभिन्न नक्षत्रों तथा ग्रहों द्वारा किया जा रहा है और उनका अंकन भी हो रहा है। यह न जानते हुए बद्धजीव अपनी कामेच्छाओं की तुष्टि के लिए सभी प्रकार के पापकर्म करता रहता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥