श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 6

 
श्लोक
क्‍वचिद्वितोया: सरितोऽभियाति
परस्परं चालषते निरन्ध: ।
आसाद्य दावं क्‍वचिदग्नितप्तो
निर्विद्यते क्‍व च यक्षैर्हृतासु: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
क्वचित्—कभी; वितोया:—जलहीन; सरित:—नदियाँ; अभियाति—नहाने जाता है अथवा भीतर कूदता है; परस्परम्—एक दूसरे से; च—तथा; आलषते—कामना करता है; निरन्ध:—अन्नहीन होने पर; आसाद्य—अनुभव करके; दावम्—पारिवारिक जीवन में जंगल की आग, दावाग्नि; क्वचित्—कभी; अग्नि-तप्त:—आग से जलने के कारण; निर्विद्यते—निराश होता है; क्व—कहीं; च—तथा; यक्षै:—डाकुओं तथा उचक्कों जैसे राजाओं द्वारा; हृत—ले लिया जाने पर, छीने जाने पर; असु:— सम्पत्ति, जो प्राणों के समान प्रिय है ।.
 
अनुवाद
 
 कभी-कभी बद्धजीव उथली नदी में कूद पड़ता है अथवा खाद्यान्न न होने पर ऐसे लोगों से अन्न माँगता है जो दानी नहीं हैं ही नहीं। कभी कभी वह गृहस्थ जीवन की अग्नि से जलने लगता है जो दावाग्नि जैसी होती है और कभी कभी वह उस सम्पत्ति के लिए दुखी हो उठता है जो उसे प्राणों से भी प्रिय है और जिसका अपहरण राजा लोग भारी आयकर के नाम पर करते हैं।
 
तात्पर्य
 सूर्य की झुलसती धूप में रहने से गर्मी अनुभव करने के कारण मनुष्य कभी-कभी नदी में कूद कर विश्रान्ति प्राप्त करना चाहता है। किन्तु यदि नदी शुष्कप्राय हो और पानी उथला हो तो कूदने वाला अपनी हड्डियाँ ही तुड़वाता है। इसी प्रकार से बद्धजीव निरन्तर कष्टों का अनुभव करता रहता है। कभी अपने मित्रों से सहायता प्राप्त करने के उसके प्रयास सूखी नदी में कूदने के समान ही सामने आते हैं। ऐसे प्रयासों से उसे कोई लाभ नहीं होता। केवल उसकी हड्डियाँ टूटती हैं। कभी-कभी अन्नाभाव के कारण मनुष्य को ऐसे व्यक्ति के पास जाना पड़ सकता है जो दान देने में असमर्थ है या फिर जान-बूझ कर देना नहीं चाहता। कभी-कभी मनुष्य गृहस्थ जीवन में ही बना रहता है, जिसकी उपमा दावाग्नि से दी गई है (संसार-दावानल-लीढ -लोक )। जब सरकार किसी पर भारी कर लगा देती है, तो मनुष्य दुखी हो जाता है। भारी कर के कारण उसे अपनी आय छिपानी पड़ती है, किन्तु सारे यत्नों के बावजूद भी कभी-कभी सरकारी एजेंट इतने सतर्क रहते हैं और इतने बलशाली होते हैं कि वे सारा धन छीन लेते हैं जिससे बद्धजीव अत्यधिक व्यथित हो जाता है।
इस प्रकार भौतिक संसार में रहकर लोग सुखी रहने का प्रयास करते हैं, किन्तु उनका यह प्रयास दावाग्नि से पीडि़त जंगल में सुखी रहने के प्रयास के तुल्य है। जंगल में जाकर कोई आग लगाता नहीं, वह स्वत: प्रकट होती है। इसी प्रकार गृहस्थ जीवन या सांसारिक जीवन में कोई दुखी नहीं रहना चाहता, किन्तु प्रकृति के सुख-दुख के नियम प्रत्येक व्यक्ति पर बरबस लादे जाते हैं। अपने भरण पोषण के लिए किसी पर आश्रित होना कितना लज्जास्पद होता है, इसीलिए वैदिक पद्धति के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को निराश्रित रहना चाहिए। केवल शूद्र ही स्वतंत्र रूप से रहने में असमर्थ हैं। उन्हें अपने भरण के लिए किसी-न किसी की सेवा करनी होती है। शास्त्रों में कहा गया है—कलौ शूद्र-सम्भवा:। इस कलियुग में प्रत्येक व्यक्ति अपने देह-भरण के लिए अन्य की कृपा पर आश्रित रहता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को शूद्र कहा गया है। श्रीमद्भागवत के बारहवें स्कंध में कहा गया है कि कलियुग में सरकार कर तो लेगी, किन्तु उसके बदले में जनता का कल्याण नहीं देखेगी। अनावृष्ट्या विनंक्ष्यन्ति दुर्भिक्ष:-कर-पीडिता:। इस युग में वर्षा की न्यूनता भी होगी जिससे अन्नाभाव होगा और सरकार द्वारा लगाये गये करों से जनता अत्यधिक पीडि़त होगी। इस प्रकार जनता शान्तिपूर्ण जीवन नहीं बिता सकेगी अत: वह अपना घर-बार छोडक़र घोर निराशावश जंगलों में चली जाएगी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥