श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  »  श्लोक 9

 
श्लोक
क्‍वचिन्निगीर्णोऽजगराहिना जनो
नावैति किञ्चिद्विपिनेऽपविद्ध: ।
दष्ट: स्म शेते क्‍व च दन्दशूकै-
रन्धोऽन्धकूपे पतितस्तमिस्रे ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
क्वचित्—कभी-कभी; निगीर्ण:—निगले जाने पर; अजगर-अहिना—अजगर नामक बड़े सर्प द्वारा; जन:—बद्धजीव; न— नहीं; अवैति—समझता है; किञ्चित्—कुछ भी; विपिने—जंगल में; अपविद्ध:—कष्ट के तीरों से बेधा हुआ; दष्ट:—दंश किया गया, काटे जाने पर; स्म—निस्संदेह; शेते—लेट जाता है; क्व च—कभी-कभी; दन्द-शूकै:—अन्य सर्पों द्वारा; अन्ध:— अन्धा; अन्ध-कूपे—अंधे कुएँ में; पतित:—गिरा हुआ; तमिस्रे—नारकीय जीवन में ।.
 
अनुवाद
 
 कभी-कभी इस भौतिक जंगल में बद्धजीव को अजगर निगल लेते हैं या मरोड़ डालते हैं। ऐसी अवस्था में वह चेतना तथा ज्ञान शून्य होकर मृत व्यक्ति तुल्य जंगल में पड़ा रहता है। कभी- कभी अन्य विषैले सर्प भी आकर काट लेते हैं। अचेतन होने के कारण वह नारकीय जीवन के अन्धे कूप में गिर जाता है जहाँ से बचकर निकल पाने की कोई आशा नहीं रहती।
 
तात्पर्य
 जब कोई व्यक्ति साँप के काटे जाने से बेहोश हो जाता है, तो उसे यह नहीं पता चलता कि बाहर क्या हो रहा है। यह बेहोशी की अवस्था गाढ़ निद्रा की अवस्था है। इसी प्रकार बद्धजीव वस्तुत: माया की गोद में सो रहा है। भक्तिविनोद ठाकुर का गीत—कत निद्रा याओ माया-पिशाचीर कोले—“हे जीवात्मा, तुम इस तरह माया की गोद में कब तक सोते रहोगे?” मनुष्यों को यह पता नहीं चल पाता कि वे इस संसार में वास्तव में सो रहे हैं और उन्हें आध्यात्मिक-जीवन का कोई ज्ञान नहीं रहता। अत: चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—
एनेछि औषधि माया नाशिबार लागि’।

हरि-नाम-महा-मंत्र लओ तुमि मागि’ ॥

“मैं प्रत्येक जीव को चिर निद्रा से जगाने की औषधि लाया हूँ। आप ईश्वर का पवित्र नाम, हरे कृष्ण महामंत्र, को अंगीकार करें और जगें।” कठोपनिषद् (१.३.१४) का भी कथन है—उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत—“हे जीवात्मा, तुम इस संसार में सो रहे हो। उठो और मनुष्य जीवन का लाभ उठाओ।” सुप्त दशा का अर्थ है ज्ञान की हानि। भगवद्गीता (२.६९) में भी कहा गया है—या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी—“जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वही संयमी पुरुषों के जगने का समय है।” यहाँ तक कि स्वर्गलोक में भी प्रत्येक प्राणी माया के वश में है। कोई भी जीवन के वास्तविक मूल्यों में रुचि नहीं रखता। सुप्त अवस्था, जिसे काल-सर्प कहा गया है, बद्धजीव को अविद्या में रखती है, जिससे शुद्ध चेतना जाती रहती है। जंगल में अनेक अंधे (भूपट्टू) कुएँ होते हैं और यदि कोई इनमें से किसी एक में गिर जाये तो फिर उससे उबरने की कोई आशा नहीं रहती। सुप्तावस्था में कुछ पशु, विशेष रूप से सर्प, मनुष्य को निरन्तर काटते रहते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥