श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 13: राजा रहूगण तथा जड़ भरत के बीच और आगे वार्ता  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 ब्राह्मण जड़ भरत राजा रहूगण पर अत्यन्त दयालु हो उठे और उसे इस जगत से छुड़ाने के लिए उन्होंने संसार रूपी जंगल (भवाटवी) का अलंकारिक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि यह संसार एक विशाल जंगल के समान है, जिसमें भौतिक जीवन के संसर्ग के कारण मनुष्य उलझ जाता है। इस जंगल में लुटेरे (छ: इन्द्रियाँ) तथा सियार, भेडिय़े तथा सिंह जैसे हिंस्र पशु (पत्नी, संतान तथा परिजन) रहते हैं, जो परिवार के मुखिया का रक्तपान करने को सदैव आतुर रहते हैं। ये सब मिलकर इस भौतिक जगत में मनुष्य की शक्ति का शोषण करना चाहते हैं। इसी जंगल में घास से ढका हुआ एक काला छेद (श्याम विवर) भी है, जिसमें कोई भी गिर सकता है। जंगल में आकर और अनेक भौतिक आकर्षणों से आसक्त होकर मनुष्य अपने को इस संसार, समाज, मित्रता, प्रेम तथा परिवार से पहचानने लगता है। रास्ता भूल जाने पर और यह न जानते हुए कि किधर जाना है, पशु-पक्षियों द्वारा सताये जाने के साथ ही वह अनेक कामनाओं का शिकार हो जाता है। इस प्रकार इस जंगल में वह परिश्रम करता हुआ इधर-उधर भटकता रहता है। वह क्षणिक सुख से प्रसन्न होता है और तथाकथित दुख से दुखी होता है। वस्तुत: इस जंगल में तथाकथित सुख-दुख के कारण वह कष्ट उठाता रहता है। कभी उस पर साँप (निद्रा) प्रहार करता है और वह सर्पदंश से हतचेतन हो जाता है। किंकर्तव्यविमूढ़ होने से वह यह नहीं समझ पाता कि क्या करे। कभी-कभी वह अपनी पत्नी को छोडक़र दूसरी स्त्री के प्रति आकृष्ट होकर उसके साथ प्रेम का आनन्द ले कर अपने आप को सुखी समझता है। उसे अनेक रोग, शोक तथा ग्रीष्म एवं शीत प्रताडि़त करते रहते हैं। इस प्रकार इस संसार रूपी जगत में भौतिक कष्ट उठाता है। सुखी बनने के उद्देश्य से जीवात्मा एक स्थान छोडक़र दूसरे स्थान को जाता है, किन्तु भौतिकतावादी (विषयी) पुरुष इस संसार में कभी सुखी नहीं रहता। भौतिक कार्यकलापों में लिप्त रहने के कारण वह सदैव विक्षुब्ध रहता है। वह भूल जाता है कि एक दिन उसे मरना भी है। घोर कष्ट उठाने पर भी वह माया से मोहग्रस्त होकर भौतिक सुख के पीछे दीवाना रहता है। इस प्रकार वह भगवान् से अपने सम्बन्ध को पूर्णत: भूल जाता है।
जड़ भरत से यह सुनकर महाराज रहूगण की कृष्णभावना जागृत हो उठी और जड भरत की संगति से उसे लाभ पहुँचा। उसे ज्ञात हो सका कि उसका मोह भंग हो चुका है, अत: उसने अपने दुर्व्यवहार के लिए जड़ भरत से क्षमा माँगी। यह सब शुकदेव गोस्वामी ने राजा परीक्षित को कह सुनाया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥