श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 25

 
श्लोक
क्‍वचिच्च शीतवाताद्यनेकाधिदैविकभौतिकात्मीयानां दशानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तचिन्तया विषण्ण आस्ते ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
क्वचित्—कभी-कभी; च—भी; शीत-वात-आदि—ठंड तथा झंझा इत्यादि; अनेक—कई; अधिदैविक—देवों द्वारा उत्पन्न, दैविक; भौतिक—अधिभौतिक, अन्य जीवों द्वारा उत्पन्न; आत्मीयानाम्—अध्यात्मिक, देह तथा मन द्वारा उत्पन्न; दशानाम्— कष्टपूर्ण दशाओं के; प्रतिनिवारणे—निवारण करने में; अकल्प:—अशक्य; दुरन्त—अत्यन्त कठोर; चिन्तया—चिन्ता के कारण; विषण्ण:—दुखी; आस्ते—रहता है ।.
 
अनुवाद
 
 भौतिक जगत के तापत्रय से अपनी रक्षा न कर सकने के कारण बद्धजीव अत्यन्त दुखी रहता है और शोकपूर्ण जीवन बिताता है। ये तीन प्रकार के संताप हैं—देवताओं द्वारा दिये जानेवाला मानसिक ताप, (यथा हिमानी हवा तथा चिलचिलाती धूप), अन्य जीवात्माओं द्वारा प्रदत्त ताप तथा मन एवं देह से उत्पन्न होने वाले ताप।
 
तात्पर्य
 तथाकथित सुखी भौतिकतावादी व्यक्ति को निरन्तर तीन प्रकार के ताप सहने पड़ते हैं, जिन्हें अधिदैविक, आध्यात्मिक तथा अधिभौतिक कहते हैं। वास्तव में इन तीनों तापों का निवारण किसी के वश का नहीं है। ये तीनों एकसाथ किसी एक समय आक्रमण कर सकते हैं, अथवा यह भी हो सकता है
कि इनमें से कोई एक ताप न सताये और अन्य उपस्थित रहें। इस प्रकार जीवात्मा निरन्तर चिन्ता से पूर्ण रहता है और उसे भय बना रहता है कि किसी न किसी ओर से ताप आ सकते हैं। बद्धजीव इन तापों में से कम से कम एक से अवश्य विचलित होता रहता है। इनसे छुटकारा नहीं मिल पाता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥