श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 33

 
श्लोक
एवमध्वन्यवरुन्धानो मृत्युगजभयात्तमसि गिरिकन्दरप्राये ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; अध्वनि—इन्द्रियतुष्टि के पथ पर; अवरुन्धान:—अवरुद्ध होने पर (फँस जाने पर) वह जीवन के वास्तविक लक्ष्य को भूल जाता है; मृत्यु-गज-भयात्—मृत्यु रूपी हाथी के डर से; तमसि—अंधकार में; गिरि-कन्दर-प्राये—पर्वत की गहन गुफाओं के सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 बद्धजीव इस भौतिक जगत में भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूलकर तथा श्रीकृष्णभावनामृत की परवाह किये बिना अनेकानेक दुष्कर्मों एवं पापों में प्रवृत्त होने लगता है। तब उसे ताप-त्रय से पीडि़त होना पड़ता है और वह मृत्यु रूपी हाथी के भय से पर्वत की गुफा के घनान्धकार में जा गिरता है।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक प्राणी मृत्यु से भयभीत है और भौतिकवादी व्यक्ति चाहे जितना ही बलवान क्यों न हो, उसे रोग तथा बुढ़ापा आने पर मृत्यु का संदेश स्वीकार करना पड़ता है। तब बद्धजीव
अत्यन्त दुखी (खिन्न) होकर मृत्यु के संदेश को ग्रहण करता है। उसके इस भय की तुलना गहन पहाड़ी गुफा में प्रवेश करने से और मृत्यु की तुलना हाथी से की गई है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥