श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 40

 
श्लोक
यदपि दिगिभजयिनो यज्विनो ये वै राजर्षय: किं तु परं मृधे शयीरन्नस्यामेव ममेयमिति कृतवैरानुबन्धायां विसृज्य स्वयमुपसंहृता: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
यत् अपि—यद्यपि; दिक्-इभ-जयिन:—जो सभी दिशाओं में विजयी होते हैं, चक्रवर्ती, दिग्विजयी; यज्विन:—बड़े-बड़े यज्ञों के करने में पटु; ये—जो सभी; वै—निस्सन्देह; राज-ऋषय:—अत्यन्त महान् सन्त राजा, राजर्षि; किम् तु—किन्तु; परम्— केवल यह पृथ्वी; मृधे—युद्ध में; शयीरन्—लेटे हुए; अस्याम्—इस (पृथ्वी) पर; एव—निश्चय ही; मम—मेरा; इयम्—यह; इति—उस प्रकार से विचार करने पर; कृत—जिस पर सृष्टि की जाती है; वैर-अनु-बन्धायाम्—अन्यों से शत्रुता का भाव; विसृज्य—त्याग कर; स्वयम्—अपना जीवन; उपसंहृता:—मारे हुए ।.
 
अनुवाद
 
 साधु प्रकृति वाले ऐसे अनेक महान् राजर्षि हो चुके हैं, जो यज्ञ अनुष्ठान में अत्यन्त प्रवीण तथा अन्य राज्यों को जीतने में परम कुशल थे, किन्तु इतनी शक्ति होने पर भी भगवान् की प्रेमाभक्ति नहीं कर पाये, क्योंकि वे महान् राजा, “मैं देह-स्वरूप हूँ और यह मेरी सम्पत्ति है” इस मिथ्या बोध को भी नहीं जीत पाये थे। इस प्रकार उन्होंने प्रतिद्वन्द्वी राजाओं से केवल शत्रुता मोल ली, उनसे युद्ध किया और वे जीवन के वास्तविक लक्ष्य को पूरा किये बिना दिवंगत हो गए।
 
तात्पर्य
 बद्धजीव का वास्तविक जीवन-उद्देश्य भगवान् के साथ विस्मृत सम्बन्ध की पुनर्स्थापना तथा भक्ति में संलग्न होना है, जिससे वह देहत्याग के पश्चात् कृष्णभावनामृत को पुनरुज्जीवित करने में समर्थ हो सके। मनुष्य को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या अन्य किसी रूप में अपनी वृत्ति छोडऩे की आवश्यकता नहीं है। किसी भी स्थिति में अपना नियत कर्तव्य करते हुए मात्र श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि स्वरूप भक्तों के सत्संग से ही कृष्णभावनामृत का विकास सम्भव है, क्योंकि वे ही इस विज्ञान की शिक्षा दे सकते हैं। दुख की बात है कि बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ एवं नेता इस भौतिक जगत में केवल शत्रुता उत्पन्न करते हैं और उनकी रुचि आध्यात्मिक उन्नति की ओर नहीं होती है। सामान्य व्यक्ति के लिए भौतिक उन्नति अत्यन्त मोहक होती है, किन्तु अन्तत: उसे परास्त होना पड़ता है, क्योंकि वह स्वयं को भौतिक देह और इससे सम्बद्ध प्रत्येक वस्तु को अपनी सम्पत्ति मान बैठता है। यही अविद्या है। वास्तव में उसका अपना कुछ भी नहीं होता, यहाँ तक कि यह देह भी नहीं। अपने कर्म के फलस्वरूप मनुष्य को कोई विशेष देह प्राप्त होती है। यदि वह इस देह का उपयोग भगवान् को प्रसन्न करने में नहीं करता तो उसके सारे कार्य निष्फल हो जाते हैं। जीवन के वास्तविक उद्देश्य का उल्लेख श्रीमद्भागवत (१.२.१३) में हुआ है—
अत: पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागश:।

स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् ॥

वस्तुत: इसका कोई महत्त्व नहीं है कि मनुष्य कौन-सा कार्य करता है। यदि वह श्रीभगवान् को केवल सन्तुष्ट कर सकता है, तो उसका जीवन सफल है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥