श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 42

 
श्लोक
तस्येदमुपगायन्ति—
आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसापि महात्मन: ।
नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मत: ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—जड़भरत का; इदम्—यह यश-गान; उपगायन्ति—गाते हैं; आर्षभस्य—ऋषभदेव के पुत्र का; इह—यहाँ; राज-ऋषे:— महान् ऋषितुल्य राजा का; मनसा अपि—मन से भी; महा-आत्मन:—महात्मा जड़भरत का; न—नहीं; अनुवर्त्म अर्हति—पथ का अनुसरण करने में समर्थ; नृप:—राजा; मक्षिका—मक्खी; इव—सदृश; गरुत्मत:—श्रीभगवान् के वाहन, गरुड़ का ।.
 
अनुवाद
 
 जड़भरत के उपदेशों का सार सुना चुकने के पश्चात् श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा—प्रिय राजा परीक्षित्, जड़भरत द्वारा निर्दिष्ट पथ श्रीभगवान् के वाहन गरुड़ द्वारा अनुगमन किये गये पथ के तुल्य है और सामान्य राजागण मक्खियों के समान हैं। मक्खियाँ गरुड़ के पथ पर नहीं जा सकतीं। आज तक बड़े-बड़े राजाओं तथा विजयी नेताओं में से किसी ने भी भक्ति-पथ का अनुसरण नहीं किया मानसिक रूप से भी नहीं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (७.३) में श्रीकृष्ण कहते हैं—
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।

यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत: ॥

“सहस्रों मनुष्यों में से कोई एक संसिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और उन सिद्धि प्राप्त करने वालों में से कोई विरला मनुष्य ही मुझे तत्त्वत: जान पाता है।” भक्ति का मार्ग अनेक शत्रुओं पर विजय पाने वाले राजाओं के लिए भी अत्यन्त कठिन है। भले ही ये राजा युद्धभूमि में विजयी रहे हों, किन्तु वे देहात्मबुद्धि पर विजय प्राप्त नहीं कर सके। ऐसे अनेक नेता, स्वामी, योगी तथा नामधारी अवतारी पुरुष हैं, जो बौद्धिक चिन्तन में लगे रहते हैं और अपने को पूर्ण पुरुष के रूप में विज्ञापित करते रहते हैं, किन्तु अन्तत: वे सफल नहीं होते। निस्सन्देह, भक्ति मार्ग का अनुगमन अत्यन्त कठिन है, किन्तु यदि कोई महाजनों के पथ का अनुसरण करना चाहता है, तो वह अत्यन्त सरल हो जाता है।

इस युग में श्री चैतन्य महाप्रभु का पथ उपलब्ध है, जिनका आविर्भाव पतित आत्माओं के उद्धार के लिए हुआ। यह पथ इतना सरल एवं सुगम है कि कोई भी श्रीभगवान् का नाम-जप करके इसे ग्रहण कर सकता है—

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।

कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥

हमें सन्तोष है कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन द्वारा इस पथ का उद्धाटन किया जा रहा है, क्योंकि अनेक योरोपीय तथा अमरीकी युवा तथा युवतियाँ इस दर्शन को गम्भीरता से ग्रहण करके क्रमश: पूर्णता प्राप्त कर रहे हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥