श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 45

 
श्लोक
यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाययोगाय साङ्ख्यशिरसे प्रकृतीश्वराय ।
नारायणाय हरये नम इत्युदारंहास्यन्मृगत्वमपि य: समुदाजहार ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
यज्ञाय—समस्त यज्ञों का फल भोगने वाले श्रीभगवान् को; धर्म-पतये—धार्मिक विधानों के स्वामी को; विधि-नैपुणाय—उसे जो निपुणता से विधि-विधान पालन करने के लिए भक्तों को ज्ञान प्रदान करता है; योगाय—साक्षात् योग को; साङ्ख्य शिरसे—सांख्य दर्शन का उपदेश देने वाले; प्रकृति-ईश्वराय—ब्रह्माण्डके परम नियन्ता को; नारायणाय—असंख्य जीवात्माओं के आश्रय (नर, जीवात्माएँ तथा अयन, आश्रय, शरण) को; हरये—हरि स्वरूप श्रीभगवान् को; नम:—सादर नमस्कार; इति—इस प्रकार; उदारम्—उच्च स्वर से; हास्यन्—हँसते हुए; मृगत्वम् अपि—मृग की देह धारण किये रहने पर भी; य:—जो; समुदाजहार—जप करता रहा ।.
 
अनुवाद
 
 मृग देह धारण करने पर भी महाराज भरत ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को विस्मृत नहीं किया; अत: जब वे मृग देह छोडऩे लगे तो उच्च स्वर से इस प्रकार प्रार्थना की, “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् साक्षात् यज्ञ पुरुष हैं। वे अनुष्ठानों का फल देने वाले हैं। वे धर्म रक्षक, योगस्वरूप, सर्वज्ञानस्रोत (सांख्य के प्रतिपाद्य), सम्पूर्ण सृष्टि के नियामक तथा प्रत्येक जीवात्मा में स्थित परमात्मा हैं। वे सुन्दर तथा आकर्षक हैं। मैं उनको नमस्कार करके यह देह त्याग रहा हूँ और आशा करता हूँ कि उनकी दिव्य सेवा में अहर्निश संलग्न रहूँगा।” यह कह कर महाराज भरत ने अपना शरीर त्याग दिया।
 
तात्पर्य
 सारे वेद कर्म, ज्ञान तथा योग को—सकाम कर्म, मनोधर्मी ज्ञान तथा योग भली- भाँति समझने के लिए हैं। हम आत्मानुभूति के चाहे जिस स्वरूप को स्वीकार करें हमारा परम लक्ष्य तो श्रीभगवान् रहते हैं, जो नारायण हैं। सभी जीवात्माएँ भक्ति के द्वारा उनसे नित्य जुड़ी हुई हैं। जैसाकि श्रीमद्भागवत में कहा गया है—अन्ते नारायणस्मृति:—मृत्यु के समय नारायण का स्मरण ही जीवन की सिद्धि है। यद्यपि महाराज भरत को मृग-देह स्वीकार करनी पड़ी, किन्तु वे मृत्यु के समय नारायण का स्मरण कर सके। फलस्वरूप उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में पूर्ण भक्त के रूप में हुआ। इससे भगवद्गीता (६.४१) के इस कथन—शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते—“जो आत्म-साक्षात्कार के पथ से नीचे
आ जाता है, वह ब्राह्मणों अथवा सदाचारी धनवानों के घर में जन्म लेता है” की पुष्टि होती है। यद्यपि महाराज भरत का जन्म राज-कुल में हुआ था, किन्तु असावधान रहने के कारण उन्हें मृग-रूप में जन्म लेना पड़ा। किन्तु मृग देह धारण करने पर वे अत्यन्त सचेष्ट रहे जिससे उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में जड़भरत के रूप में हुआ। इस जन्म में वे आजीवन कृष्णभक्त रहे और प्रत्यक्ष रूप से श्रीकृष्ण भक्ति के सन्देश का पहला उपदेश महाराज रहूगण से प्रारम्भ किया। इस प्रसंग में योगाय शब्द अत्यन्त सार्थक है। जैसाकि श्रील मध्वाचार्य ने बताया है, अष्टांग योग का प्रयोजन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ अपने को जोडऩा है। इसका लक्ष्य भौतिक सिद्धियों का प्रदर्शन नहीं है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥