श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 5

 
श्लोक
तत्रगतो दंशमशकसमापसदैर्मनुजै: शलभशकुन्ततस्करमूषकादिभिरुपरुध्यमानबहि:प्राण: क्‍वचित् परिवर्तमानोऽस्मिन्नध्वन्यविद्याकामकर्मभिरुपरक्तमनसानुपपन्नार्थं नरलोकं गन्धर्वनगरमु पपन्नमिति मिथ्याद‍ृष्टिरनुपश्यति ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—उस गृहस्थ जीवन तक; गत:—जाकर; दंश—डाँस; मशक—मच्छर; सम—तुल्य; अपसदै:—निम्न वर्ग के; मनु-जै:— मनुष्यों द्वारा; शलभ—पतंगा, टिड्डी; शकुन्त—एक बड़ा शिकारी पक्षी; तस्कर—चोर; मूषक-आदिभि:—चूहों इत्यादि के द्वारा; उपरुध्यमान—सताया जाकर; बहि:-प्राण:—बाह्य प्राणवायु, जो धन आदि के रूप में होती है; क्वचित्—कभी; परिवर्तमान:—भ्रमण करते हुए; अस्मिन्—इसमें; अध्वनि—भौतिक जगत का मार्ग; अविद्या-काम—अज्ञान तथा लोभ से; कर्मभि:—एवं सकाम कर्मों के द्वारा; उपरक्त-मनसा—मन के प्रभावित हो जाने के कारण; अनुपपन्न-अर्थम्—जिसमें वांछित फल कभी प्राप्त नहीं हो पाते; नर-लोकम्—यह भौतिक जगत; गन्धर्व-नगरम्—गंधर्वों की पुरी, हवाई महल; उपपन्नम्— विद्यमान; इति—ऐसा मानते हुए; मिथ्या-दृष्टि:—जिसको दृष्टि दोष हो; अनुपश्यति—देखता है ।.
 
अनुवाद
 
 सांसारिक सम्पत्ति एवं वैभव में आसक्त गृहस्थाश्रम में बद्धजीव को कभी डाँस तथा मच्छर, तो कभी टिड्डी, शिकारी पक्षी व चूहे सताते हैं। फिर भी वह भौतिक जगत के पथ पर चलता रहता है। अविद्या के कारण वह लोभी बन जाता है और सकाम कर्म में लग जाता है। चूँकि उसका मन इन कार्यकलापों में रमा रहता है इसलिए उसे यह भौतिक जगत नित्य लगता है, यद्यपि यह गंधर्वनगर (हवाई महल) की भाँति अनित्य है।
 
तात्पर्य
 नरोत्तम दास ठाकुर का गीत है—
अहंकारे मत्त हञा, निताइ-पद पासरिया असत्येरे सत्य करि मानि नित्यानन्द प्रभु के चरणारविन्दों को विस्मरण करने और सांसारिक धन-वैभव के कारण फूले रहने से मनुष्य इस झूठे क्षणिक भौतिक जगत को वास्तविक मान बैठता है। यही भव रोग है। यह जीवात्मा चिरन्तन और आनन्दपूर्ण है, किन्तु दुखी भौतिक अवस्थाओं के बावजूद वह अज्ञानवश इस भौतिक जगत को ही वास्तविक मान बैठता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥