श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  »  श्लोक 8

 
श्लोक
अथ कदाचिन्निवासपानीयद्रविणाद्यनेकात्मोपजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्तत: परिधावति ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—इस प्रकार; कदाचित्—कभी-कभी; निवास—वासस्थान; पानीय—जल; द्रविण—धन; आदि—इत्यादि; अनेक— विविध प्रकार के; आत्म-उपजीवन—जो देह तथा आत्मा को एकसाथ रखने के लिए आवश्यक समझे जाते हैं; अभिनिवेश:— पूर्णतया लीन; एतस्याम्—इस; संसार-अटव्याम्—विशाल वन के सदृश इस भौतिक जगत में; इत: तत:—इधर-उधर; परिधावति—चारों ओर दौड़ धूप करता है ।.
 
अनुवाद
 
 कभी-कभी यह बद्धजीव रहने के लिए वासस्थान खोजने एवं अपने शरीर की रक्षा के लिए जल तथा धन प्राप्त करने में लगा रहता है। इन नाना प्रकार की आवश्यकताओं को जुटाने में संलग्न रहने के कारण वह सब कुछ भूल जाता है और भौतिक अस्तित्त्व के जंगल में निरन्तर इधर-उधर दौड़-धूप करता रहता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि इसके पूर्व कहा जा चुका है निर्धन वणिक जंगल में इसलिए जाता है कि वहाँ उसे सस्ती वस्तुएँ मिल सकेंगी जिन्हें लाकर वह नगर में लाभ सहित बेचेगा। किन्तु वह अपनी देह तथा आत्मा को तुष्ट रखने में इतना लीन हो जाता है कि उसे कृष्ण से अपने पूर्व सम्बन्ध का स्मरण ही नहीं रह जाता और वह मात्र शारीरिक सुख-सुविधाओं की खोज करता है। इस प्रकार जीवात्मा की एकमात्र व्यस्तता भौतिक क्रियाकलापों में रहती है। जीवन के उद्देश्य को न जानते हुए भौतिकवादी निरन्तर भौतिकता के पीछे दौड़ता है। प्रचुर आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त कर लेने पर भी जीवन के उद्देश्य को न समझने के कारण उसकी कृत्रिम आवश्यकताओं में वृद्धि होती जाती है और वह अधिकाधिक उलझता जाता है। वह ऐसी मानसिक स्थिति उत्पन्न कर देता है, जिसमें उसे अधिकाधिक सुविधाओं की जरूरत रहती है। भौतिकतावादी को प्रकृति के विधि-विधानों का मर्म ज्ञात नहीं होता। जैसा किभगवद्गीता (३.२७) में पुष्टि की गई है—
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै कर्माणि सर्वश:।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

“सम्पूर्ण कर्म वास्तव में प्रकृति के गुणों द्वारा सम्पादित होते हैं, परन्तु गुणों से मोहित जीवात्मा अपने को इनका कर्ता मान बैठता है।” कामेच्छा के कारण जीवात्मा अपने मन में यह धारणा बना लेता है कि इसका भोग करना चाहिए। इस प्रकार वह फँस कर विभिन्न देहों में प्रवेश करता है और कष्ट पाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥