श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 15: राजा प्रियव्रत के वंशजों का यश-वर्णन  »  श्लोक 7

 
श्लोक
स वै स्वधर्मेण प्रजापालन पोषणप्रीणनोपलालनानुशासनलक्षणेनेज्यादिना च भगवति महापुरुषे परावरे ब्रह्मणि सर्वात्मनार्पितपरमार्थलक्षणेन ब्रह्मविच्चरणानुसेवयाऽऽपादितभगवद्‍भक्तियोगेन चाभीक्ष्णश: परिभावितातिशुद्ध मतिरुपरतानात्म्य आत्मनि स्वयमुपलभ्यमानब्रह्मात्मानुभवोऽपि निरभिमान एवावनिमजूगुपत् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह राजा गय; वै—निश्चय ही; स्व-धर्मेण—अपने कर्तव्य के द्वारा; प्रजा-पालन—प्रजा का पालन करने; पोषण—प्रजा का भरण करने; प्रीणन—सभी तरह से उसे सुखी बनाने; उपलालन—उसे पुत्र की भाँति रखने; अनुशासन—कभी-कभी त्रुटियों के लिए दण्डित करने; लक्षणेन—राजा के लक्षणों से; इज्या-आदिना—वेदोक्त विधि से यज्ञ सम्पन्न करके; च—भी; भगवति—श्रीभगवान्, विष्णु; महा-पुरुषे—समस्त जीवात्माओं में प्रमुख; पर-अवरे—भगवान् ब्रह्मा से लेकर अकिंचन चींटी तक समस्त जीवात्माओं का स्रोत; ब्रह्मणि—परब्रह्म पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वासुदेव में; सर्व-आत्मना—सभी प्रकार से; अर्पित—समर्पित, शरणागत; परम-अर्थ-लक्षणेन—चिन्मय लक्षणों से; ब्रह्म-वित्—स्वरूप-सिद्ध सन्त भक्तों के; चरण- अनुसेवया—चरणारविन्दों की सेवा करके; आपादित—प्राप्त किया; भगवत्-भक्ति-योगेन—भगवान् की भक्ति के अभ्यास से; च—भी; अभीक्ष्णश:—अनवरत, सतत्; परिभावित—संतृप्त; अति-शुद्ध-मति:—जिसकी विशुद्ध चेतना (ऐसी पूर्ण चेतना कि शरीर तथा मन आत्मा से पृथक् है); उपरत-अनात्म्ये—जिसमें भौतिक वस्तुओं की पहचान रुक जाती है; आत्मनि—अपने में; स्वयम्—स्वयं; उपलभ्यमान—साक्षात्कार होते हुए; ब्रह्म-आत्म-अनुभव:—अपनी स्थिति का परब्रह्म के रूप में दर्शन; अपि—यद्यपि; निरभिमान:—अभिमानरहित, झूठी बड़ाई के बिना; एव—इस प्रकार; अवनिम्—सम्पूर्ण संसार पर; अजूगुपत्—वैदिक विधियों के अनुसार दृढ़ता से शासन किया ।.
 
अनुवाद
 
 राजा गय ने अपनी प्रजा को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जिससे अवांछित तत्त्वों के द्वारा उनकी निजी सम्पत्ति को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचे। उन्होंने इसका भी ध्यान रखा कि प्रजा को पर्याप्त भोजन प्राप्त हो (यही “पोषण” है)। कभी-कभी प्रजा को प्रसन्न रखने के लिए वे दान देते थे (यह “प्रीणन” कहलाता है)। कभी-कभी वे प्रजा की सभाएं बुलाते और मृदु वचनों से उन्हें तुष्टि प्रदान करते (यह “उपलालन” कहलाता है)। वे उन्हें उच्चकोटि के नागरिक बनने की शिक्षा देते (यह “अनुशासन” कहलाता है)। राजा गय में इस प्रकार की विलक्षणताएँ थीं। इन सबके साथ ही साथ राजा गय गृहस्थ थे और वे गृहस्थ जीवन के सभी नियमों का कड़ाई से पालन करते थे। वे यज्ञ करते थे तथा श्रीभगवान् के एकनिष्ठ भक्त थे। वे महापुरुष कहे जाते थे, क्योंकि राजा के रूप में उन्होंने नागरिकों को सभी सुविधाएं प्रदान कीं गृहस्थ के रूप में वे सभी कर्तव्यों का पालन करने वाले थे। फलस्वरूप वे अन्तत: भगवान् के परम भक्त हुए। भक्त के रूप में वे सभी भक्तों का आदर करने और भगवान् की सेवा करने को उद्यत रहते थे। यह भक्तियोग की प्रक्रिया है। इन दिव्य कर्मों के कारण राजा गय देहात्मबोध से सदैव मुक्त रहे। वे ब्रह्मसाक्षात्कार में लीन रहने के कारण सदैव प्रमुदित रहते थे। उन्हें भौतिक पश्चात्ताप का अनुभव नहीं करना पड़ा। सभी प्रकार से पूर्ण होने पर भी वे न तो गर्व करते थे, न ही राज्य करने लिए लालायित थे।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है कि वे धरती पर दो प्रकार के प्रयोजनों से अवतरित होते हैं—साधु पुरुषों का उद्धार करने तथा असुरों का नाश करने (परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् )। राजा श्रीभगवान् का प्रतिनिधि होता है, इसीलिए उसे कभी-कभी नरदेव अर्थात् मनुष्यों का स्वामी कहते हैं। वैदिक आदेशों के अनुसार संसार में उसकी ईश्वर तुल्य पूजा की जाती है। श्रीभगवान् का प्रतिनिधि होने के नाते राजा का यह परम कर्तव्य होता था कि वह प्रजा की भलीभाँति रक्षा करे जिससे प्रजा को भोजन तथा सुरक्षा की चिन्ता न रहे और वह प्रसन्न चित्त रहे। राजा प्रजा को सभी कुछ देता था और इन सबके लिए वह उन पर कर लगाता था। यदि कोई राजा या राज सत्ता किसी और कारण से कर लगाता है,
तो वह प्रजा के पापों का भागी होता है। कलियुग में (एकाधिकार) राजतंत्र समाप्त हो गया है क्योंकि राजाओं पर भी इस कलियुग का प्रभाव पड़ गया है। रामायण से पता चलता है कि विभीषण ने राजा रामचन्द्र के साथ मैत्री स्थापित हो जाने के बाद वचन दिया था कि यदि वह दैववश या इच्छा से उनके साथ मित्रता भंग करे तो कलियुग में वह ब्राह्मण या राजा बनेगा। जैसाकि विभीषण ने संकेत किया है, इस युग में ब्राह्मण तथा राजा दोनों ही दयनीय स्थिति को प्राप्त हैं। सच तो यह है कि इस युग में न तो कोई राजा है, न ब्राह्मण और उनके न होने से सम्पूर्ण विश्व अव्यवस्थित है और सदैव संकटग्रस्त बना हुआ है। वर्तमान मानदण्ड के अनुसार महाराज गय विष्णु के सच्चे प्रतिनिधि थे, इसीलिए वे महापुरुष कहलाए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥