श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 11

 
श्लोक
मन्दरो मेरुमन्दर: सुपार्श्व: कुमुद इत्ययुतयोजनविस्तारोन्नाहा मेरोश्चतुर्दिशमवष्टम्भगिरय उपक्‍ल‍ृप्ता: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
मन्दर:—मन्दर नामक पर्वत; मेरु-मन्दर:—मेरु-मन्दर पर्वत; सुपार्श्व:—सुपार्श्व पर्वत; कुमुद:—कुमुद पर्वत; इति—इस प्रकार; अयुत-योजन-विस्तार-उन्नाहा:—जिनकी ऊँचाई तथा चौड़ाई दस हजार योजन है; मेरो:—सुमेरु की; चतु:-दिशम्—चारों दिशाएँ; अवष्टम्भ-गिरय:—पर्वत जो सुमेरु की मेखलाओं के सदृश हैं; उपकॢप्ता:—स्थित हैं ।.
 
अनुवाद
 
 सुमेरु पर्वत की चारों दिशाओं में मन्दर, मेरुमन्दर, सुपार्श्व तथा कुमुद नामक चार पर्वत हैं, जो इसकी मेखलाओं के सदृश हैं। ये पर्वत १०,००० योजन (८०,००० मील) ऊँचे तथा इतने ही चौड़े हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥