श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 19

 
श्लोक
एवं जम्बूफलानामत्युच्चनिपातविशीर्णानामनस्थिप्रायाणामिभकायनिभानां रसेन जम्बू नाम नदी मेरुमन्दरशिखरादयुतयोजनादवनितले निपतन्ती दक्षिणेनात्मानं यावदिलावृतमुपस्यन्दयति ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इसी प्रकार; जम्बू-फलानाम्—जामुन के फलों का; अति-उच्च-निपात—अत्यधिक ऊँचाई से गिरने के कारण; विशीर्णानाम्—खण्ड-खण्ड हो जाने से; अनस्थि-प्रायाणाम्—अत्यन्त लघु बीज होने के कारण; इभ-काय-निभानाम्—और जो हाथी के शरीर के सदृश विशाल हैं; रसेन—रस के द्वारा; जम्बू नाम नदी—जम्बू नामक नदी; मेरु-मन्दर-शिखरात्—मेरु मन्दर पर्वत के शिखर से; अयुत-योजनात्—दस हजार योजन ऊँची; अवनि-तले—पृथ्वी तल पर; निपतन्ती—गिरती हुई; दक्षिणेन—दक्षिण दिशा में; आत्मानम्—स्वयमेव; यावत्—सम्पूर्ण; इलावृतम्—इलावृतवर्ष से; उपस्यन्दयति—होकर बहती है ।.
 
अनुवाद
 
 इसी प्रकार रस से भरे और अत्यन्त छोटी गुठली वाले जामुन के फल अत्यधिक ऊँचाई से गिरकर खण्ड-खण्ड हो जाते हैं। ये फल हाथी जैसे आकार वाले होते हैं और इनका रस बहकर जम्बूनदी का रूप धारण कर लेता है। यह नदी इलावृत के दक्षिण में मेरुमन्दर की चोटी से दस हजार योजन नीचे गिरकर समस्त इलावृत भूखण्ड को रस से आप्लावित करती है।
 
तात्पर्य
 हम यह अनुमान लगा सकते रहते हैं कि हाथी जैसे आकार वाले फल, जिसमें गुठली नाममात्र की हो, कितना अधिक रस होता होगा। अत: स्वाभाविक है कि जामुन के फलों के फटने से रस पहले झरनों
के रूप में बहता है और फिर इलावृत के पूरे प्रदेश को आप्लावित कर देता है। इस रस से प्रभूत मात्रा में स्वर्ण उत्पन्न होता है, जैसाकि अगले श्लोकों में कहा गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥