श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 9

 
श्लोक
एवं दक्षिणेनेलावृतं निषधो हेमकूटो हिमालय इति प्रागायता यथा
नीलादयोऽयुतयोजनोत्सेधा हरिवर्षकिम्पुरुषभारतानां यथासङ्ख्यम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; दक्षिणेन—दक्षिण दिशा में; इलावृतम्—इलावृत वर्ष के; निषध: हेम-कूट: हिमालय:—निषध, हेमकूट तथा हिमालय ये तीन पर्वत; इति—इस प्रकार; प्राक्-आयता:—पूर्व दिशा तक विस्तारित; यथा—जिस प्रकार; नील- आदय:—नील इत्यादि पर्वत; अयुत-योजन-उत्सेधा:—दस हजार योजन ऊँचा; हरि-वर्ष—हरिवर्ष नामक खण्ड; किम्पुरुष— किंपुरुष नामक खण्ड; भारतानाम्—भारतवर्ष नामक खण्ड; यथा-सङ्ख्यम्—संख्यानुसार, क्रमश: ।.
 
अनुवाद
 
 इसी प्रकार, इलावृत-वर्ष के दक्षिण में तथा पूर्व से पश्चिम को फैले हुए तीन विशाल पर्वत हैं (उत्तर से दक्षिण को) जिनके नाम हैं—निषध, हेमकूट तथा हिमालय। इनमें से प्रत्येक १०,००० योजन (८०,००० मील) ऊँचा है। ये हरिवर्ष, किम्पुरुष-वर्ष तथा भारतवर्ष नामक तीन वर्षों की सीमाओं के सूचक हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥