श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 14

 
श्लोक
नवस्वपि वर्षेषु भगवान्नारायणो महापुरुष: पुरुषाणां तदनुग्रहायात्मतत्त्वव्यूहेनात्मनाद्यापि सन्निधीयते ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
नवसु—नवों; अपि—निश्चय ही; वर्षेषु—वर्षों में; भगवान्—श्रीभगवान्; नारायण:—विष्णु; महा-पुरुष:—परम पुरुष; पुरुषाणाम्—विभिन्न भक्तों में; तत्-अनुग्रहाय—कृपा प्रदर्शित करने के लिए; आत्म-तत्त्व-व्यूहेन—अपने चतुर्गुण रूपों वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध में विस्तार करके; आत्मना—स्वयं; अद्य अपि—आज तक; सन्निधीयते—उनकी सेवा स्वीकार करने के लिए भक्तों के निकट हैं ।.
 
अनुवाद
 
 इन सभी नौ वर्षों में अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जिन्हें नारायण कहा जाता है, अपने चतुर्व्यूह रूपों—वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध—में विस्तार करते हैं। इस प्रकार अपने भक्तों की सेवा स्वीकार करने के लिए वे उनके निकट रहते हैं।
 
तात्पर्य
 इस प्रसंग में विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने बताया है कि सभी देवता परमेश्वर की उनके विविध श्रीविग्रह (अर्चा-विग्रह) रूपों में इसलिए पूजा करते हैं, क्योंकि दिव्य लोक के अतिरिक्त अन्यत्र साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की प्रत्यक्ष पूजा नहीं की जा सकती। भौतिक जगत में भगवान् की पूजा मन्दिर में अर्चा-विग्रह अथवा श्रीविग्रह के रूप में की जाती है। अर्चा-विग्रह तथा मूल पुरुष में कोई अन्तर नहीं होता, अत: जो लोग इस लोक में ऐश्वर्यपूर्ण मन्दिरों में श्रीविग्रह की पूजा करने में रत रहते है उन्हें निश्चित रूप से श्रीभगवान् के प्रत्यक्ष सम्पर्क में मानना चाहिए। शास्त्रों में जैसाकि कहा गया है—अर्च्ये विष्णौ शिलाधीर्गुरुषु नरमति:—“न तो मन्दिर स्थित श्रीविग्रह को पत्थर या धातु मानना चाहिए और न ही गुरु को सामान्य व्यक्ति।” प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह इस शास्त्र के इस आदेश का पालन करके श्रीभगवान् के श्रीविग्रह की पूजा निरपराध भाव से करे। गुरु ईश्वर का साक्षात् प्रतिनिधि होता है—कोई उसे सामान्य व्यक्ति न समझे। कोई भी व्यक्ति श्रीविग्रह तथा गुरु के प्रति अपराध से विरत रहकर अपने आध्यात्मिक जीवन को उन्नत कर सकता है अथवा कृष्णभावनाभावित हो सकता है।
इस सम्बन्ध में लघुभागवतामृत में प्राप्त निम्नलिखित उद्धरण दृष्टव्य है—

पाद्मे तु परमव्योम्न: पूर्वाद्ये दिक्चतुष्टये।

वासुदेवादयो व्यूहश्चत्वार: कथिता: क्रमात् ॥

तथा पादविभूतौ च निवसन्ति क्रमादि मे।

जलावृतिस्थवैकुण्ठस्थित वेदवतीपुरे ॥

सत्योर्ध्वे वैष्णवे लोके नित्याख्ये द्वारकापुरे।

शुद्धोदादुत्तरे श्वेतद्वीपे चैरावतीपुरे ॥

क्षीराम्बुधिस्थितान्ते क्रोडपर्यंकधामनि सात्वतीये क्वचित् तन्त्रे नव व्यूहा: प्रकीर्तिता:।

चत्वारो वासुदेवाद्या नारायणनृसिंहकौ ॥

हयग्रीवो महाक्रोडो ब्रह्मा चेति नवोदिता:।

तत्र ब्रह्मा तु विज्ञेय: पूर्वोक्तविधया हरि: ॥

“पद्मपुराण में यह कहा गया है कि आध्यात्मिक लोक में भगवान् स्वत: समस्त दिशाओं में विस्तार करते हैं और वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध रूप में पूजित हैं। वे ही भगवान् इस भौतिक जगत में जो उनकी सृष्टि का चतुर्थांश हैं श्रीविग्रह रूप में प्रदर्शित किये जाते हैं। इस भौतिक जगत की चारों दिशाओं में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध भी उपस्थित रहते हैं। इस भौतिक जगत में जल के नीचे वैकुण्ठ लोक है, जिसमें वेदवती नामक स्थान है जहाँ वासुदेव स्थित है। एक अन्य लोक, जिसे विष्णुलोक कहते हैं, सत्यलोक के ऊपर स्थित है, जहाँ संकर्षण उपस्थित हैं। इसी प्रकार द्वारकापुरी में प्रद्युम्न का आधिपत्य है। श्वेतद्वीप में क्षीर सागर है। इसी सागर के मध्य में ऐरावती पुर नामक स्थान है जहाँ अनन्तशायी अनिरुद्ध हैं। कतिपय सात्वत तंत्रों में नौ वर्षों एवं उनमें पूजित प्रधान श्रीविग्रहों का वर्णन मिलता है। वे है—वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, नृसिंह, हयग्रीव, महावराह तथा ब्रह्मा।” इस प्रसंग में स्वयं ब्रह्मा ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। जब कोई जीव ब्रह्मा बनने के योग्य नहीं पाया जाता है, तो भगवान् स्वयं ब्रह्मा का स्थान ले लेते हैं। तत्र ब्रह्मा तु विज्ञेय: पूर्वोक्तविधया हरि:। यहाँ पर वर्णित ब्रह्मा साक्षात् हरि हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥