श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 15

 
श्लोक
इलावृते तु भगवान् भव एक एव पुमान्न ह्यन्यस्तत्रापरो निर्विशति भवान्या: शापनिमित्तज्ञो यत्प्रवेक्ष्यत: स्त्रीभावस्तत्पश्चाद्वक्ष्यामि ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
इलावृते—इलावृत-वर्ष में; तु—लेकिन; भगवान्—सर्वशक्तिमान; भव:—भगवान् शिव; एक—एकमात्र; एव—निश्चय ही; पुमान्—पुरुष; न—नहीं; हि—अवश्य ही; अन्य:—दूसरा कोई; तत्र—वहाँ; अपर:—के अतिरिक्त; निर्विशति—प्रवेश करता है; भवान्या: शाप-निमित्त-ज्ञ:—शिव की पत्नी भवानी के शाप का कारण जानने वाला; यत्-प्रवेक्ष्यत:—बलपूर्वक उस प्रदेश में प्रवेश करने वाले का; स्त्री-भाव:—स्त्री में परिवर्तन; तत्—वह; पश्चात्—बाद में; वक्ष्यामि—मैं व्याख्या करूँगा ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा—इलावृत वर्ष नामक भूखण्ड में भगवान् शिव ही एकमात्र पुरुष हैं जो देवताओं में सर्वाधिक शक्तिमान है। भगवान् शिव की पत्नी देवी दुर्गा नहीं चाहतीं कि उस प्रदेश में कोई भी पुरुष प्रवेश करे। यदि कोई मूर्ख पुरुष प्रवेश करने का दुस्साहस करता है, तो वे उसे तत्क्षण स्त्री में परिणत कर देती हैं। इसकी व्याख्या मै बाद में (नवम स्कन्ध में) करूँगा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥