श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 16

 
श्लोक
भवानीनाथै: स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महापुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मन: सङ्कर्षणसंज्ञामात्मसमाधिरूपेण सन्निधाप्यैतदभिगृणन् भव उप-धावति ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
भवानी-नाथै:—भवानी के संग से; स्त्री-गण—स्त्रियों का; अर्बुद-सहस्रै:—सौ अरब; अवरुध्यमान:—सदैव सेवित होकर; भगवत: चतु:-मूर्ते:—चतुर्गुण रूप में विस्तारित श्रीभगवान्; महा-पुरुषस्य—परम पुरुष का; तुरीयाम्—चतुर्थ विस्तार; तामसीम्—तमोगुण से सम्बद्ध; मूर्तिम्—रूप; प्रकृतिम्—स्रोत स्वरूपा; आत्मन:—स्वयं (भगवान् शिव) का; सङ्कर्षण संज्ञाम्—संकर्षण नाम से विख्यात; आत्म-समाधि-रूपेण—समाधि में स्वयं के ध्यान के द्वारा; सन्निधाप्य—निकट लाकर; एतत्—यह; अभिगृणन्—स्पष्ट रूप से कीर्तन करके; भव:—भगवान् शिव; उपधावति—पूजा करता है ।.
 
अनुवाद
 
 इलावृत्त वर्ष में भगवान् शंकर सदैव दुर्गा की सौ अरब दासियों से घिरे रहते है जो उनकी सेवा करती हैं। परमात्मा का चतुर्गुण विस्तार वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण में हुआ है। इनमें चतुर्थ विस्तार संकर्षण है जो निश्चित रूप से दिव्य है, किन्तु भौतिक जगत में उनका संहार-कार्य तमोगुणमय है, अत: वे तामसी अर्थात् तमोगुणी-ईश्वर कहलाते हैं। भगवान् शिव को ज्ञात है कि संकर्षण उनके अपने अस्तित्व के मूल कारण हैं, अत: वे समाधि में निम्नलिखित मंत्र का जप करते हुए उनका ध्यान करते हैं।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी हम भगवान् शंकर का ध्यानावस्थित चित्र देखते हैं। इस श्लोक में बताया गया है कि शिवजी समाधि में सदा संकर्षण का ध्यान करते रहते हैं। शिव इस जगत के संहारक हैं। ब्रह्मा इस जगत की सृष्टि करते हैं तथा भगवान् विष्णु इसका पालन करते हैं और शिवजी इसका संहार करते हैं। चूँकि संहार तमोगुण है,
अत: शिवजी तथा उनके उपास्य संकर्षण को तामसी कहा गया है। शिवजी तमोगुण के अवतार हैं। चूँकि शिवजी तथा संकर्षण दोनों प्रबुद्ध हैं और दिव्य पद पर स्थित हैं, अत: वे भौतिक गुणों—सतो, रजो तथा तमो—से कोई सरोकार नहीं रखते, किन्तु उनके कर्म उन्हें तमोगुणी बनाते हैं, अत: वे कभी-कभी तामसी कहलाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥