श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 17

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यानायानन्तायाव्यक्ताय नम इति ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् शंकर कहते हैं; ॐ नमो भगवते—भगवान् को मैं आदरपूर्वक प्रणाम करता हूँ; महा-पुरुषाय— आप महापुरुष है; सर्व-गुण-सङ्ख्यानाय—समस्त दिव्य गुणों के आगार; अनन्ताय—अपरिमित; अव्यक्ताय—भौतिक जगत में न प्रगट होने वाले; नम:—प्रणाम करता हूँ; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 परम शक्तिमान भगवान् शिव कहते हैं—हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, मैं संकर्षण के रूप में आपको प्रणाम करता हूँ। आप समस्त दिव्य गुणों के आगार हैं। अनन्त होकर भी आप अभक्तों के लिए अप्रकट रहते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥