श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 18

 
श्लोक
भजे भजन्यारणपादपङ्कजंभगस्य कृत्‍स्‍नस्य परं परायणम् ।
भक्तेष्वलं भावितभूतभावनंभवापहं त्वा भवभावमीश्वरम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
भजे—मैं पूजा करता हूँ; भजन्य—हे आराध्य स्वामी; अरण-पाद-पङ्कजम्—जिसके चरणकमल भक्तों के सभी प्रकार के भयों से रक्षा करते हैं; भगस्य—ऐश्यर्व का; कृत्स्नस्य—विभिन्न प्रकार के (धन, यश, बल, ज्ञान, रूप तथा त्याग); परम्—श्रेष्ठ; परायणम्—परम शरण; भक्तेषु—भक्तों के लिए; अलम्—अनुमान से परे; भावित-भूत-भावनम्—भक्तों के परितोष के लिए अपने विभिन्न रूपों को प्रकट करने वाला; भव-अपहम्—भक्त के जन्म-मरण चक्र को रोकने वाले; त्वा—आपको; भव भावम्—भौतिक सृष्टि का मूल; ईश्वरम्—भगवान् को ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभो, आप ही एकमात्र आराध्य हैं, क्योंकि आप ही समस्त ऐश्वर्यों के आगार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। आपके चरण-कमल भक्तों के एकमात्र आश्रय हैं। आप भक्तों को अपने नाना रूपों द्वारा सन्तुष्ट करने वाले हैं। हे प्रभो, आप अपने भक्तों को भौतिक संसार के चंगुल से छुड़ाने वाले हैं। आपकी इच्छा से ही अभक्त लोग इस भौतिक संसार में उलझे रहते हैं। कृपया मुझे अपने नित्य दास के रूप में स्वीकार करें।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥