श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 19

 
श्लोक
न यस्य मायागुणचित्तवृत्तिभि-र्निरीक्षतो ह्यण्वपि द‍ृष्टिरज्यते ।
ईशे यथा नोऽजितमन्युरंहसांकस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मन: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; यस्य—जिसकी; माया—माया शक्ति, माया; गुण—गुणों में; चित्त—हृदय की; वृत्तिभि:—क्रियाओं के द्वारा (चिन्तन, अनुभव तथा इच्छा); निरीक्षत:—निरीक्षण करने वाले का; हि—निश्चय ही; अणु—कुछ-कुछ; अपि—भी; दृष्टि:— दृष्टि; अज्यते—प्रभावित होती है; ईशे—नियमन हेतु; यथा—जिस प्रकार; न:—हम लोगों का; अजित—जो जीता न जा सके; मन्यु—क्रोध के; रंहसाम्—वेग को; क:—कौन; तम्—उस (ईश्वर) को; न—नहीं; मन्येत—पूजा करेगा; जिगीषु:—जीतने की कामना करने वाला; आत्मन:—इन्द्रियों को ।.
 
अनुवाद
 
 हम अपने क्रोध के वेग को रोक नहीं पाते, अत: जब हम भौतिक वस्तुओं को देखते हैं तो उनसे आकर्षित या विकर्षित हुए बिना नहीं रह पाते। किन्तु परमेश्वर इस प्रकार कभी भी प्रभावित नहीं होते। यद्यपि इस भौतिक जगत की सृष्टि, पालन तथा संहार के हेतु इस पर दृष्टिपात करते हैं, किन्तु इससे रंचमात्र भी प्रभावित नहीं होते। अत: वह जो अपनी इन्द्रियों के वेग पर विजय प्राप्त करना चाहता है, उसे श्रीभगवान् के चरमकमलों की शरण लेनी चाहिए। तभी वह विजयी होगा।
 
तात्पर्य
 भगवान् सदा अचिन्त्य शक्तियों से युक्त रहते हैं। यद्यपि उनके द्वारा भौतिक शक्ति (माया) पर दृष्टिपात करते ही सृष्टि हो जाती है, किन्तु भौतिक प्रकृति के गुणों से वे अप्रभावित रहते है। जब भगवान् इस भौतिक जगत में प्रकट
होते हैं, तो उनकी दिव्य स्थिति के कारण भौतिक प्रकृति के गुण उनमें व्याप्त नहीं होते। इसीलिए भगवान् दिव्य कहलाते हैं। फलत: जो भी भौतिक प्रकृति के गुणों के प्रभाव से बचना चाहता है उसे उनकी शरण ग्रहण करनी चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥