श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 20

 
श्लोक
असद्‍दृशो य: प्रतिभाति मायया क्षीबेव मध्वासवताम्रलोचन: ।
न नागवध्वोऽर्हण ईशिरे ह्रियायत्पादयो: स्पर्शनधर्षितेन्द्रिया: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
असत्-दृश:—कुत्सित दृष्टि वाले व्यक्ति के हेतु; य:—जो; प्रतिभाति—प्रतीत होता है; मायया—माया के वश में; क्षीब:— क्रुद्ध; इव—सदृश; मधु—शहद; आसव—तथा सुरा द्वारा; ताम्र-लोचन:—ताँबे के समान रक्तनेत्र वाला; न—नहीं; नाग- वध्व:—नागों की स्त्रियाँ; अर्हणे—पूजन; ईशिरे—करने में अशक्त; ह्रिया—लज्जावश; यत्-पादयो:—जिसके चरणकमल के; स्पर्शन—स्पर्श से; धर्षित—उत्तेजित; इन्द्रिया:—जिसकी इन्द्रियाँ ।.
 
अनुवाद
 
 कुत्सित दृष्टि वाले व्यक्तियों के लिए भगवान् के नेत्र मदिरा पीये हुए उन्मत्त पुरुष जैसे हैं। ऐसे अविवेकी पुरुष भगवान् पर रुष्ट होते हैं और अपने रोषवश उन्हें श्रीभगवान् अत्यन्त रुष्ट एवं भयावह लगते हैं। किन्तु यह माया है। जब भगवान् के चरणकमलों के स्पर्श से नाग-वधुएँ उत्तेजित हुईं तो वे लज्जावश उनकी और अधिक आराधना नहीं कर पाईं फिर भी भगवान् उनके स्पर्श से उत्तेजित नहीं हुए, क्योंकि समस्त परिस्थितियों में वे धीर बने रहते हैं। अत: ऐसा कौन होगा जो भगवान् की आराधना करना नहीं चाहेगा?
 
तात्पर्य
 उत्तेजना का कारण रहते हुए भी जो उत्तेजित नहीं होता वह धीर कहलाता है। भगवान् सदैव दिव्य स्थिति में रहने के कारण कभी भी किसी प्रकार उत्तेजित नहीं होते। अत: यदि कोई धीर बनना चाहता है, तो उसे भगवान् के चरणकमलों की शरण में जाना चाहिए। भगवद्गीता (२.१३) में श्रीकृष्ण का कथन है, धीरस्तत्र न मुह्यति—ऐसा पुरुष जो सभी परिस्थितियों
में धीर बना रहता है कभी किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं होता। प्रह्लाद महाराज धीर के ज्वलन्त उदाहरण हैं। जब नृसिंहदेव हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए अपने विकराल रूप में प्रकट हुए तो प्रह्लाद तनिक भी उत्तेजित नहीं हुए। वे शान्त और स्थिर बने रहे, जबकि अन्य सभी, यहाँ तक कि ब्रह्माजी भी, भगवान् के रूप से भयभीत हो गए थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥