श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 21

 
श्लोक
यमाहुरस्य स्थितिजन्मसंयमंत्रिभिर्विहीनं यमनन्तमृषय: ।
न वेद सिद्धार्थमिव क्‍वचित्स्थितंभूमण्डलं मूर्धसहस्रधामसु॒ ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
यम्—जिसको; आहु:—उन्होंने कहा; अस्य—इस भौतिक जगत की; स्थिति—पोषण; जन्म—सृष्टि; संयमम्—संहार; त्रिभि:—इन तीनों; विहीनम्—से रहित; यम्—जो; अनन्तम्—अनन्त, असीम्; ॠषय:—समस्त महान् ऋषि; न—नहीं; वेद— अनुभव करते हैं; सिद्ध-अर्थम्—सरसों का बीज; इव—के समान; क्वचित्—जहाँ; स्थितम्—स्थित; भू-मण्डलम्—यह ब्रह्माण्ड; मूर्ध-सहस्र-धामसु—भगवान् के सैकड़ों हजारों फणों पर ।.
 
अनुवाद
 
 शिवजी कहते हैं—सभी महान् ऋषि भगवान् को सृजक, पालक और संहारक के रूप में स्वीकार करते हैं, यद्यपि वास्तव में उनका इन कार्यों से कोई सरोकार नहीं है। इसीलिए श्रीभगवान् को अनन्त कहा गया है। यद्यपि शेष अवतार के रूप में वे अपने फणों पर समस्त ब्रह्माण्डों को धारण करते हैं, किन्तु प्रत्येक ब्रह्माण्ड उन्हें सरसों के बीज से अधिक भारी नहीं लगता। अत: सिद्धि का इच्छुक ऐसा कौन पुरुष होगा जो ईश्वर की आराधना नहीं करेगा?
 
तात्पर्य
 श्रीभगवान् के शेष या अनन्त अवतार में असीम शक्ति, यश, वैभव, ज्ञान, सौन्दर्य तथा त्याग भरा है। इस श्लोक में बताया गया है कि अनन्त अवतार में इतनी महान् शक्ति है कि उनके फणों पर असंख्य ब्रह्माण्ड टिके हैं। उनका शरीर हजार फणों वाले सर्प की भाँति है और अपार शक्ति होने के कारण फणों पर टिके सभी ब्रह्माण्ड सरसों के बीज से अधिक भारी नहीं प्रतीत होते। हम सहज कल्पना कर सकते हैं कि सर्प फण पर स्थित सरसों
का बीज कितना नगण्य होता है। इस प्रसंग में पाठकों को चाहिए कि वे चैतन्यचरितामृत आदिलीला अध्याय ५, श्लोक ११७-१२५ पढ़ें। उसमें यह कहा गया है कि अनन्त शेषनाग के रूप में श्रीविष्णु का अवतार समस्त ब्रह्माण्डों को अपने फणों पर धारण किये है। हमारी गणना के अनुसार भले ही कोई ब्रह्माण्ड कितना ही भारी क्यों न हो, किन्तु अनन्त होने के कारण श्रीभगवान् को वह सरसों के बीज से अधिक भारी नहीं लगता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥