श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 22-23

 
श्लोक
यस्याद्य आसीद् गुणविग्रहो महान्विज्ञानधिष्ण्यो भगवानज: किल ।
यत्सम्भवोऽहं त्रिवृता स्वतेजसावैकारिकं तामसमैन्द्रियं सृजे ॥ २२ ॥
एते वयं यस्य वशे महात्मन:स्थिता: शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिता: ।
महानहं वैकृततामसेन्द्रिया:सृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिससे; आद्य:—आरम्भ; आसीत्—था; गुण-विग्रह:—गुणों का अवतार; महान्—सम्पूर्ण माया; विज्ञान—सम्पूर्ण ज्ञान का; धिष्ण्य:—आगार; भगवान्—सर्व-शक्तिमान; अज:—भगवान् ब्रह्मा; किल—निश्चय ही; यत्—जिससे; सम्भव:— उत्पन्न, सम्भूत; अहम्—मैं; त्रि-वृता—तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार का; स्व-तेजसा—अपनी शक्ति से; वैकारिकम्—सभी देवता; तामसम्—भौतिक तत्त्व; ऐन्द्रियम्—इन्द्रियाँ; सृजे—उत्पन्न करता हूँ; एते—इन सबों को; वयम्—हम; यस्य—जिसके; वशे—वश में; महा-आत्मन:—महान् पुरुष; स्थिता:—स्थित; शकुन्ता:—गृद्ध; इव—सदृश; सूत्र-यन्त्रिता:—सूत्र (डोरी) के द्वारा बद्ध; महान्—महत्तत्व; अहम्—मैं; वैकृत—देवतागण; तामस—पाँच तत्त्व; इन्द्रिया:—इन्द्रियाँ; सृजाम:—हम सृष्टि करते हैं; सर्वे—हम सभी; यत्—जिसकी; अनुग्रहात्—कृपा से; इदम्—यह भौतिक जगत ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से ही ब्रह्माजी प्रकट होते हैं, जिनका शरीर महत् तत्त्व से निर्मित है और वह भौतिक प्रकृति के रजोगुण द्वारा प्रभावित बुद्धि का आगार है। ब्रह्माजी से मैं स्वयं मिथ्या अहंकार रूप में, जिसे रुद्र कहते हैं, उत्पन्न होता हूँ। मैं अपनी शक्ति से अन्य समस्त देवताओं, पंच तत्त्वों तथा इन्द्रियों को जन्म देता हूँ। अत: मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की आराधना करता हूँ। वे हम सबों से श्रेष्ठ हैं और सभी देवता, महत् तत्त्व तथा इन्द्रियाँ, यहाँ तक कि ब्रह्माजी और स्वयं मैं उनके वश में वैसे ही हैं जिस प्रकार कि डोरी से बँधे पक्षी। केवल उन्हीं के अनुग्रह से हम इस जगत का सृजन, पालन एवं संहार करते हैं। अत: मैं परमब्रह्म को सादर प्रणाम करता हूँ।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में सृष्टि का सारांश दिया गया है। संकर्षण से महाविष्णु और महाविष्णु से गर्भोदकशायी विष्णु का विस्तार होता है। ब्रह्माजी का जन्म इन्हीं विष्णु से हुआ और ब्रह्माजी से शिवजी का जन्म हुआ जिनसे अन्य समस्त देवताओं का क्रम से विकास हुआ। ब्रह्माजी, शिवजी तथा श्रीविष्णु भिन्न-भिन्न गुणों से युक्त अवतार हैं। भगवान् विष्णु समस्त भौतिक गुणों से परे हैं, किन्तु वे सत्त्व गुण को वश में रखते
हैं जिससे ब्रह्माण्ड का पोषण होता है। ब्रह्माजी की उत्पत्ति महत्तत्व से हुई। ब्रह्माजी ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सृजन करने वाले हैं, श्रीविष्णु इसका पालन करने वाले और शिवजी इसका संहार करने वाले हैं। श्रीभगवान् समस्त प्रमुख देवताओं को—विशेषत: ब्रह्माजी तथा शिवजी को वैसे ही अपने वश में रखते हैं जिस प्रकार डोरी से बँधे कोई पक्षी का मालिक। कभी-कभी गृद्ध भी इसी तरह वशीभूत किये जाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥