श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 6

 
श्लोक
सीता तु ब्रह्मसदनात्केसराचलादिगिरिशिखरेभ्योऽधोऽध: प्रस्रवन्ती गन्धमादनमूर्धसु पतित्वान्तरेण भद्राश्ववर्षं प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्रमभिप्रविशति ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
सीता—सीता नामक धारा; तु—निश्चय ही; ब्रह्म-सदनात्—ब्रह्मपुरी से; केसराचल-आदि—केसराचल तथा अन्य महान् पर्वतों के; गिरि—पवर्तों की; शिखरेभ्य:—चोटियों से; अध: अध:—नीचे की ओर; प्रस्रवन्ती—प्रवाहित; गन्धमादन—गंध-मादन पर्वत की; मूर्धसु—चोटी पर; पतित्वा—गिर कर; अन्तरेण—के अन्तर्गत; भद्राश्व-वर्षम्—भद्राश्व प्रदेश; प्राच्याम्—पूर्व; दिशि—दिशा में; क्षार-समुद्रम्—लवण सागर में; अभिप्रविशति—प्रवेश करती है ।.
 
अनुवाद
 
 गंगा नदी की सीता नामक धारा मेरु पर्वत की चोटी पर स्थित ब्रह्मपुरी से होकर बहती हुई पार्श्ववर्ती केसराचल पर्वतों के शृंगों पर पहुँचती है। जो मेरु पर्वत जितने ही ऊंचे है। ये पर्वत मेरु पर्वत के चारों ओर तन्तुगुच्छ जैसे हैं। केसराचल पर्वतों से चलकर गंगा नदी गंधमादन पर्वत की चोटी पर गिरती है और वहाँ से भद्राश्व-वर्ष की भूमि में बहती है। अन्त में यह पश्चिम में लवण सागर में पहुँच जाती है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥