श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 7

 
श्लोक
एवं माल्यवच्छिखरान्निष्पतन्ती ततोऽनुपरतवेगा केतुमालमभि चक्षु: प्रतीच्यां दिशि सरित्पतिं प्रविशति ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; माल्यवत्-शिखरात्—माल्यवान् पर्वत की चोटी से; निष्पतन्ती—नीचे गिरकर; तत:—तत्पश्चात्; अनुपरत वेगा—अप्रतिहत वेग से; केतुमालम् अभि—केतुमाल वर्ष में; चक्षु:—चक्षु नामक धारा; प्रतीच्याम्—पश्चिम; दिशि—दिशा में; सरित्-पतिम्—सागर में; प्रविशति—प्रवेश करती है ।.
 
अनुवाद
 
 गंगा नदी की चक्षु नामक धारा माल्यवान् पर्वत की चोटी पर गिरती है और वहाँ से प्रपात के रूप में गिरकर केतुमाल वर्ष में प्रवेश करती है। अविच्छिन्न रूप से केतुमाल वर्ष से बहकर गंगा नदी पश्चिम की ओर लवण सागर तक पहुँच जाती है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥