श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 17: गंगा-अवतरण  »  श्लोक 8

 
श्लोक
भद्रा चोत्तरतो मेरुशिरसो निपतिता गिरिशिखराद्‌गिरिशिखरमतिहाय श‍ृङ्गवत: श‍ृङ्गादवस्यन्दमाना उत्तरांस्तु कुरूनभित उदीच्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
भद्रा—भद्रा नामक धारा; च—भी; उत्तरत:—उत्तर दिशा को; मेरु-शिरस:—मेरु पर्वत की चोटी से; निपतिता—गिर कर; गिरि-शिखरात्—कुमुद पर्वत की चोटी से; गिरि-शिखरम्—नील पर्वत की चोटी तक; अतिहाय—बिना स्पर्श किये पार करके; शृङ्गवत:—शृंगवान् पर्वत की; शृङ्गात्—चोटी से; अवस्यन्दमाना—प्रवाहित होकर; उत्तरान्—उत्तरी; तु—किन्तु; कुरून्—कुरु प्रदेश की; अभित:—चारों दिशाओं में; उदीच्याम्—उत्तरी; दिशि—दिशा में; जलधिम्—लवण सागर में; अभिप्रविशति—प्रवेश करती है ।.
 
अनुवाद
 
 गंगा की भद्रा नामक धारा मेरु पर्वत की उत्तरी दिशा से होकर बहती है। इसका जल क्रमश: कुमुद, नील, श्वेत तथा शृंगवान् पर्वतों की चोटियों पर गिरता है। फिर वह कुरु प्रदेश में से बहती हुई उत्तर में लवण सागर से मिल जाती है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥