श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 14

 
श्लोक
तस्माद्रजोरागविषादमन्यु-
मानस्पृहाभयदैन्याधिमूलम् ।
हित्वा गृहं संसृतिचक्रवालं
नृसिंहपादं भजताकुतोभयमिति ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—अत:; रज:—रजोगुण का; राग—भौतिक वस्तुओं के प्रति लगाव; विषाद—तब निराशा; मन्यु—क्रोध; मान स्पृहा—समाज में सम्मानित बनने की कामना; भय—भय; दैन्य—दीनता का; अधिमूलम्—मूल कारण; हित्वा—परित्याग करके; गृहम्—गृहस्थ जीवन; संसृति-चक्रवालम्—जन्म-मरण का चक्र; नृसिंह-पादम्—भगवान् नृसिंह देव के चरणारविन्द; भजत—पूजा करते हुए; अकुत:-भयम्—निर्भीकता की शरण; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 अत:, हे असुरगण, गृहस्थ जीवन के तथाकथित सुख का परित्याग करके भगवान् नृसिंह देव के चरणारविन्दों की शरण ग्रहण करो। वे ही निर्भीकता की वास्तविक शरण-स्थली हैं। सांसारिक अनुरक्ति, दुर्दमनीय कामनाएँ, विषाद, क्रोध, निराशा, भय, झूठी प्रतिष्ठा की भूख इन सबका मूल कारण गृहस्थ जीवन में आसक्ति है, जिसके कारण जीवन-मरण का चक्र चलता रहता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥