श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 17

 
श्लोक
तद्भ‍गवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमा देवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताह:सु च तद्भ‍‌र्तृभिरुपास्ते इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—वह; भगवत:—श्रीभगवान् का; माया-मयम्—भक्तों के लिए स्नेह से पूरित; रूपम्—रूप; परम—सर्वोच्च; समाधि योगेन—प्रभु की सेवा में मन तल्लीन होने से; रमा—लक्ष्मी; देवी—दिव्य नारी; संवत्सरस्य—संवत्सर नामक; रात्रिषु—रात्रि में; प्रजापते:—प्रजापति की; दुहितृभि:—पुत्रियों के साथ; उपेत—मिलकर; अह:सु—दिन में; च—भी; तत्-भर्तृभि:—पतियों के साथ; उपास्ते—पूजा करती हैं; इदम्—यह; च—भी; उदाहरति—जप करती हैं ।.
 
अनुवाद
 
 लक्ष्मीजी संवत्सर की अवधि में दिन के समय प्रजापति के पुत्रों के साथ और रात्रि में उनकी पुत्रियों के साथ मिलकर परम दयालु कामदेव रूप में भगवान् की पूजा करती हैं। भक्ति में तल्लीन रहकर लक्ष्मीजी निम्नलिखित मंत्रों का जप करती हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में प्रयुक्त मायामयम् शब्द का अर्थ मायावादियों की विवेचना के अनुसार नहीं ग्रहण करना चाहिए। माया का अर्थ प्रेम तथा मोह (भ्रम) दोनों है। जब माता अपने बालक को प्यार करती है, तो वह मायामय कहलाती है। भगवान् विष्णु चाहे जिस रूप में प्रकट हों, वे अपने भक्तों पर सदैव स्नेहिल रहते हैं, अत: यहाँ मायामयम् शब्द का व्यवहार, “भक्तों के प्रति अत्यन्त स्नेहिल” अर्थ में हुआ है। श्रील जीव गोस्वामी लिखते हैं कि इस सम्बन्ध में मायामयम् का एक अर्थ कृपा-प्रचुरम् (अत्यधिक दयालु) भी हो सकता है। इसी प्रकार
श्रील वीर राघव कहते हैं—माया प्रचुरनात्मीयसंकल्पेन परिगृहीतम् इत्यर्थ: ज्ञानपर्यायोऽत्र मायाशब्द:—जब अन्तरंग सम्बन्धों के कारण कोई अत्यन्त स्नेहिल होता है, तो उसे मायामय कहा जाता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने मायामयम् को माया तथा आमयम् शब्दों में विभक्त करके व्याख्या की है। वे इन शब्दों की व्याख्या इस प्रकार करते हैं—चूंकि जीवात्मा मोह रोग से घिरा है, अत: भगवान् अपने भक्त को माया के चंगुल से छुड़ाने और माया के कारण उत्पन्न रोग से छुड़ाने के लिए सदैव उद्यत रहते हैं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥