श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 22

 
श्लोक
मत्प्राप्तयेऽजेशसुरासुरादय-
स्तप्यन्त उग्रं तप ऐन्द्रियेधिय: ।
ऋते भवत्पादपरायणान्न मां
विन्दन्त्यहं त्वद्‌धृदया यतोऽजित ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
मत्-प्राप्तये—मेरी दया प्राप्त करने के लिए; अज—ब्रह्माजी; ईश—शिवजी; सुर—अन्य देवता जिनके स्वामी इन्द्र, चन्द्र तथा वरुण हैं; असुर-आदय:—असुर भी; तप्यन्ते—तप करते हैं; उग्रम्—कठिन; तप:—तपस्या; ऐन्द्रिये धिय:—जिनके मस्तिष्क महत् इन्द्रियतृप्ति में लीन रहते हैं; ऋते—जब तक; भवत्-पाद-परायणात्—जो श्रीभगवान् के चरणारविन्द की सेवा में एकान्त भाव से तल्लीन रहते हैं; न—नहीं; माम्—मुझको; विन्दन्ति—प्राप्त करते हैं; अहम्—मैं; त्वत्—आप में; हृदया:—जिनके हृदय; यत:—अत:; अजित—हे दुर्जेय ।.
 
अनुवाद
 
 हे अजेय परमेश्वर, मेरा आशीर्वाद पाने के लिए इन्द्रियसुख के अभिलाषी ब्रह्माजी तथा शिवजी आदि समस्त सुर-असुरगण घोर तपस्या करते हैं, किन्तु आपके चरणारविन्द की सेवा में संलग्न भक्त के अतिरिक्त अन्य पर मैं अनुग्रह नहीं करती, चाहे वह कितना भी महान् क्यों न हो। चूँकि मैं निरन्तर आपको अपने हृदय में बसाये रहती हूँ इसलिए मैं भक्त के अतिरिक्त अन्य किसी पर अनुग्रह नहीं करती।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में सौभाग्य की देवी लक्ष्मीजी स्पष्ट बताती हैं कि वे किसी संसारी व्यक्ति पर अनुग्रह नहीं करतीं। भले ही कोई संसारी व्यक्ति दूसरे संसारी व्यक्ति की दृष्टि में कितना ही ऐश्वर्यवान् क्यों न बन जाये, ऐसे ऐश्वर्य की दात्री स्वयं लक्ष्मी देवी न होकर सौभाग्य की देवी अंशरूपा भगवती दुर्गा देवी होती हैं। जिन्हें धन-धान्य की कामना होती है वे दुर्गादेवी की आराधना इस मंत्र से करते हैं—धनं देहि रूपं देहि रूपपतिभाजं देहि—“हे माता दुर्गे! मुझे धन, बल, यश, पत्नी इत्यादि दें।” देवी दुर्गा को प्रसन्न करके ऐसे वर प्राप्त किये जा सकते हैं, किन्तु वे क्षणिक होने के कारण माया-सुख ही प्रदान करने वाले होते हैं। जैसाकि प्रह्लाद महाराज ने कहा है—मायासुखाय भरमुद्वहतो विमूढान्— जो भौतिक लाभों के लिए अत्यन्त श्रम करते हैं, वे विमूढ़ हैं, क्योंकि ऐसा सुख स्थायी नहीं होता। दूसरी ओर प्रह्लाद तथा ध्रुव महाराज जैसे भक्त हैं, जिन्होंने अद्वितीय ऐश्वर्य प्राप्त किया। किन्तु वह माया-सुख नहीं था। जब किसी भक्त को अद्वितीय ऐश्वर्य प्राप्त होता है, तो यह नारायण के हृदय में वास करने वाली ऐश्वर्य की देवी का प्रत्यक्ष दान होता है।
देवी दुर्गा की स्तुति करके प्राप्त किया हुआ ऐश्वर्य क्षणिक होता है। जैसाकि भगवद्गीता (७.२३) में कहा गया है—अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्—अल्पबुद्धि प्राणी ही क्षणिक सुख की कामना करते हैं। हमें ज्ञात है कि भक्ति सिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के एक शिष्य ने अपने गुरु की सम्पत्ति का भोग करना चाहा तो दयालु गुरु ने सहर्ष उसे ऐसा करने की अनुमति तो दे दी, किन्तु विश्व भर में श्री चैतन्य महाप्रभु सम्प्रदाय के उपदेश देने की अपनी शक्ति नहीं दी। उपदेश देने की यह विशिष्ट शक्ति केवल उस भक्त को दी जाती है जो अपने गुरु से किसी संसारी वस्तु की कामना नहीं करता वरन् गुरु की सेवा ही करना चाहता है। दृष्टान्त के रूप में असुर रावण की कथा सटीक होगी। यद्यपि रावण ने ऐश्वर्य की देवी सीता देवी को भगवान् रामचन्द्र के अधिकार से हरण कर लेना चाहा, किन्तु वह ऐसा नहीं कर पाया। उसने जिस सीता देवी को बलपूर्वक हरण किया वह वास्तविक सीता देवी न होकर माया रूप अथवा दुर्गा देवी थी। फलस्वरूप ऐश्वर्य की देवी की कृपा प्राप्त करने के बजाय दुर्गा देवी की शक्ति से रावण सपरिवार विनष्ट हो गया (सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेका )।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥