श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 36

 
श्लोक
यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो
गुणेषु दारुष्विव जातवेदसम् ।
मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिद‍ृक्षवो
गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसका; स्व-रूपम्—स्वरूप; कवय:—महान् सन्त; विपश्चित:—परम सत्य को सुनिश्चित करने में पटु; गुणेषु—तीन गुणों से युक्त भौतिक जगत में; दारुषु—काष्ठ में; इव—सदृश; जात—प्रकट; वेदसम्—अग्नि; मथ्नन्ति—मथते हैं; मथ्ना— अरणी या मथानी से उत्पन्न अग्नि; मनसा—मन के द्वारा; दिदृक्षव:—उत्सुकजन; गूढम्—छिपे; क्रिया-अर्थै:—कर्मों तथा उनके फलों के द्वारा; नम:—नमस्कार है; ईरित-आत्मने—प्रकट होने वाले प्रभु को ।.
 
अनुवाद
 
 ऋषि तथा मुनि काठ में छिपी अग्नि को अरणी के द्वारा उत्पन्न कर सकने में समर्थ हैं। हे प्रभो, परम सत्य को समझने में दक्ष ऐसे व्यक्ति आपको प्रत्येक वस्तु में, यहाँ तक कि अपने शरीर में भी देखने का प्रयास करते हैं किन्तु आप फिर भी अप्रकट रहते हैं। मानसिक या भौतिक क्रियाओं जैसी अप्रत्यक्ष विधियों से आपको नहीं समझा जा सकता। आप स्वत: प्रकट होने वाले हैं, अत: जब आप देख लेते हैं कि कोई व्यक्ति सर्वभावेन आपकी खोज में संलग्न है तभी आप अपने को प्रकट करते हैं। अत: मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ।
 
तात्पर्य
 क्रियार्थे: शब्द का अर्थ है, “देवताओं को प्रसन्न करने के निमित्त अनुष्ठानों द्वारा।” विपश्चित: शब्द की व्याख्या तैत्तिरीय उपनिषद् में इस प्रकार दी गई है—सत्यं-ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्। सोऽश्नुतेसर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति। जैसाकि श्रीकृष्ण भगवद्गीता (७.१९) में कहते हैं—बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते—“बहुत जन्मांतरों के अन्त में तत्त्वज्ञान को प्राप्त पुरुष मुझे सब कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है।” जब मनुष्य को यह बोध हो जाता है कि भगवान् सबके हृदयों में विद्यमान हैं और जब वह भगवान् को वास्तव में कण-कण में उपस्थित देखता है, तो वह पूर्ण ज्ञानी होता है। जातवेद: शब्द का तात्पर्य है,
“वह अग्नि जो काष्ठ के रगडऩे से उत्पन्न होती है।” वैदिक युग में ऋषियों द्वारा काष्ठ से अग्नि उत्पन्न की जाती थी। जातवेद: का अर्थ जठराग्नि भी होता है जो हमारे खाए हुए भोजन को पचाने वाली और भूख उत्पन्न करने वाली होती है। गूढ शब्द की विवेचना श्वेताश्वतर उपनिषद् में की गई है। एको देव: सर्वभूतेषु गूढ:—वैदिक मंत्रों के जाप से ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को जाना जा सकता है। सर्वव्यापी सर्व-भूतान्तरात्मा—वह सर्वव्यापी है और प्रत्येक जीवात्मा के हृदय में स्थित है। कर्माध्यक्ष: सर्वभूताधिवास:—वह जीवात्मा के सभी व्यापारों का साक्षी है। साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च—परमात्मा साक्षी होने के साथ-साथ जीवनी शक्ति भी हैं, तो भी वह समस्त भौतिक गुणों से परे हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥