श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 38

 
श्लोक
करोति विश्वस्थितिसंयमोदयं
यस्येप्सितं नेप्सितमीक्षितुर्गुणै: ।
माया यथायो भ्रमते तदाश्रयं
ग्राव्णो नमस्ते गुणकर्मसाक्षिणे ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
करोति—करता है; विश्व—ब्रह्मांड की; स्थिति—भरण; संयम—विलोप; उदयम्—सृष्टि; यस्य—जिसका; ईप्सितम्—वांछित; न—नहीं; ईप्सितम्—वांछित; ईक्षितु:—ऊपर से देखने वाले का; गुणै:—गुणों के द्वारा; माया—माया; यथा—जितना; अय:—लोहा; भ्रमते—भ्रमण करता है; तत्-आश्रयम्—उसके निकट स्थित; ग्राव्ण:—चुम्बक पत्थर; नम:—नमस्कार; ते— आपको; गुण-कर्म-साक्षिणे—भौतिक प्रकृति की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के साक्षी ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभो, आप इस भौतिक जगत की सृष्टि, पालन या संहार के इच्छुक नहीं हैं, किन्तु बद्धजीवों के लिए अपनी सृजनात्मक शक्ति के द्वारा इन क्रियाओं को निष्पादित करते हैं। जिस प्रकार चुम्बक-पत्थर के प्रभाव से लोहे का टुकड़ा घूमता है ठीक उसी प्रकार जब आप समस्त माया पर दृष्टि फेरते हैं, तो सारे जड़ पदार्थ गति करने लगते हैं।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी मन में यह प्रश्न उठता है कि भगवान् ने जीवों के लिए अनेक प्रकार के कष्टों से पूर्ण इस भौतिक जगत की सृष्टि क्यों की है। यहाँ यह उत्तर दिया गया है कि श्रीभगवान् जीवों को कष्ट भोगने मात्र के लिए भौतिक जगत की सृष्टि नहीं करना चाहते। परमेश्वर तो बद्धआत्माओं के सुख-भोग के लिए इसकी सृष्टि करते हैं।
प्रकृति के कार्यकलाप स्वत: नहीं चलते रहते। प्रकृति (माया) पर भगवान् की दृष्टि पडऩे से ही प्रकृति उसी प्रकार आश्चर्यजनक तरीके से कार्यशील हो जाती है, जिस प्रकार कि चुम्बक पत्थर के कारण लोहे के टुकड़े इधर-उधर घुमने लगते हैं। चूँकि भौतिकतावादी विज्ञानी तथा नामधारी सांख्य दार्शनिक ईश्वर में विश्वास नहीं करते, इसलिए वे प्रकृति को बिना किसी अधीक्षक के कार्यशील होती मानते हैं। किन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है। चैतन्यचरितामृत (आदि ६.१८-१९) में भौतिक जगत की उत्पत्ति की व्याख्या इस प्रकार दी गई है—

यद्यपि सांख्य माने, ‘प्रधान’—कारण।

जड़ हइते कभु नहे जगत-सृजन ॥

निज सृष्टिशक्ति प्रभु संचारे प्रधाने।

ईश्वरेर शक्त्ये तबे हये त’ निर्माणे ॥

“नास्तिक सांख्य दार्शनिक सोचते हैं कि समग्र भौतिक शक्ति से विराट जगत की सृष्टि होती है, किन्तु वे गलती पर हैं। जड़ पदार्थ में गति करने की शक्ति नहीं होती, अत: यह स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकता। भगवान् अपनी सृजन शक्ति का भौतिक अवयवों में संचार करते हैं। तब भगवान् की शक्ति से द्रव्य गति करता है और परस्पर क्रिया करता है।” सागर की तरंगें वायु द्वारा गतिशील होती हैं, वायु का सृजन आकाश से होता है और प्रकृति के त्रिगुणों के विक्षोभ से आकाश की उत्पत्ति होती है तथा वे त्रिगुण समग्र भौतिक शक्ति (माया) पर भगवान् की कृपादृष्टि से परस्पर क्रिया करते हैं। अत: सभी प्राकृतिक घटनाओं के मूलाधार श्रीभगवान् ही हैं जैसाकि भगवद्गीता में पुष्टि की गई है (मयाध्यक्षेणप्रकृति: सूयते सचराचरम् )। इसकी व्याख्या चैतन्यचरितामृत (आदि ५.५९-६१) में भी की गई है—

जगत्कारण नहे प्रकृति जड़रूपा।

शक्ति सञ्चारिया तारे कृष्ण करे कृपा ॥

कृष्णशक्त्ये प्रकृति हय गौण कारण।

अग्निशक्तये लौह यैछे करये जारण ॥

अतएव कृष्ण मूल-जगत्कारण।

प्रकृति—कारण यैछे अजागलस्तन ॥

“चूँकि प्रकृति जड़ रूप है, अत: यह भौतिक जगत का वास्तविक कारण नहीं हो सकती। भगवान् श्रीकृष्ण जड़ प्रकृति में अपनी शक्ति का संचार करके अनुग्रह प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण की शक्ति से प्रकृति गौण कारणस्वरूप है, जिस प्रकार से लोहा अग्नि की शक्ति से लाल होता है। अत: श्रीकृष्ण इस विराट जगत के मूल कारण हैं। प्रकृति बकरी के उस गलस्तन के तुल्य है, जिसमें से दूध नहीं निकलता।” इस तरह वैज्ञानिकों तथा दार्शनिकों की यह भारी भूल है कि वे पदार्थ (जड़) को स्वतंत्र रूप से गतिशील मानते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥