श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 18: जम्बूद्वीप के निवासियों द्वारा भगवान् की स्तुति  »  श्लोक 6

 
श्लोक
वेदान् युगान्ते तमसा तिरस्कृतान्रसातलाद्यो नृतुरङ्गविग्रह: ।
प्रत्याददे वै कवयेऽभियाचतेतस्मै नमस्तेऽवितथेहिताय इति ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
वेदान्—चारों वेदों को; युग-अन्ते—कल्प के अन्त में; तमसा—साक्षात् अज्ञानरूपी दैत्यों द्वारा; तिरस्कृतान्—चुराये जाकर; रसातलात्—रसातल (निम्नतम लोक) से; य:—जो (श्रीभगवान्); नृ-तुरङ्ग-विग्रह:—आधा घोड़ा तथा आधा मनुष्य का रूप धारण कर; प्रत्याददे—लौटा दिया; वै—निश्चय ही; कवये—परम कवि (भगवान् ब्रह्मा) को; अभिया-चते—उनके माँगने पर; तस्मै—उनको (हयग्रीव रूप); नम:—मेरा नमस्कार है; ते—आपको; अवितथ-ईहिताय—जिसका संकल्प विफल नहीं होता; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 कल्प के अन्त में साक्षात् अज्ञान एक दैत्य का रूप धारण कर सभी वेदों को चुरा कर उन्हें रसातल ले गया। किन्तु श्रीभगवान् ने हयग्रीव का रूप धारण करके वेदों को पुन: प्राप्त किया और ब्रह्माजी के विनय करने पर उन्हें लाकर दे दिया। हे सत्यसंकल्प पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 यद्यपि वैदिक ज्ञान अनश्वर है, किन्तु इस भौतिक जगत में कभी वह प्रकट होता है, तो कभी लुप्त होता रहता है। जब इस भौतिक जगत के प्राणी अज्ञान में डूब जाते हैं, तो वैदिक ज्ञान लुप्त हो जाता है। किन्तु भगवान् हयग्रीव अथवा मत्स्य भगवान् वैदिक ज्ञान
की सदैव रक्षा करते हैं और वह ज्ञान यथासमय ब्रह्माजी के माध्यम से पुन: वितरित होने लगता है। ब्रह्माजी ही श्रीभगवान् के विश्वासपात्र प्रतिनिधि हैं, अत: जब उन्होंने वैदिक ज्ञान-कोष की पुन: याचना की तो भगवान् ने उनकी इच्छा पूरी की।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥